Thursday, May 10, 2018

युवराज का इरादा, कर्नाटक का अड़ंगा

आखिर राहुल गांधी ने जता दिया, कि कांग्रेस को बहुमत मिलने पर प्रधानमंत्री बनने की उनकी तैयारी है। राजनीति में उतरने के बाद 14 वर्षों तक लूका-छिपी खेलने के बाद आखिर उन्हें पता चला, कि रण में उतरना है तो सिंहासन का लक्ष्य रखना लाजिमी है। यह पहली बार है, कि कांग्रेस के युवराज ने किसी भी तरह की जिम्मेदारी उठाने के लिए हामी भरी है। वरना अब तक वे सत्ता को विष बताकर राजनीतिक उपवास करते रहे जिसके तहत उनके पास कोई कुर्सी तो नहीं थी लेकिन अधिकार बराबर रहते थे।
कर्नाटक के पत्रकारों ने उन्हें पूछा था, कि यदि सन 2019 में कांग्रेस सबसे बडी पार्टी बनकर उभरी तो क्या वे प्रधानमंत्री बनेंगे? उसे उत्तर देते हुए उन्होंने एक सकारात्मक जवाब दिया। इस कदम को उनके बढ़े हुए आत्मविश्वांस का भी प्रतीक माना जा सकता है और उनकी मजबूरी का भी। आखिर वे अब कांग्रेस अध्यक्ष है और जिस तरह के परिवारवादी ढर्रे पर कांग्रेस चलती है, उसके चलते उनके अलावा कांग्रेस के पास अन्य कोई विकल्प है नही। कांग्रेस ने जब 2004 में बहुमत प्राप्त किया था, उस समय सोनिया गांधी के पास प्रधानमंत्री बनने का अवसर था लेकिन उनके इतालवी जन्म के कारण वे पद पर आसीन नहीं हो सकी। राहुल के संदर्भ में ऐसी कोई बाधा नहीं है। इसलिए अगर सचमुच कांग्रेस यह चमत्कार कर भी पाए, तो राहुल के अलावा कोई और नाम तो कांग्रेस के पास है नहीं। जब उखली में सर दिया तो मुसल से क्या डरना, इस कहावत के अनुरूप फिर युवराज ने भी ताल ठोंक दिया है। हालांकि, कौन प्रधानमंत्री बनना चाहता है और नहीं, यह फिलहाल मुद्दा नहीं है।
मुद्दा यह है, कि राहुल गांधी के इस आत्मविश्वा सपूर्ण पैंतरे में एक शर्त है। उनकी यह तैयारी एक इच्छा बनी रहेगी क्योंकि अगर उसे पूरी होनी है, तो कांग्रेस को 201 9 में लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना होगा। पिछले कुछ वर्षों में का इतिहास स्पष्ट बताता है, कि यह संभव नहीं है। यदि राहुल की इच्छा पूरी होती है, तो यह उनकी मेहनत और नीति का नतीजा नहीं बल्कि भाग्य का चक्र कहा जाएगा।
उनकी इस चुनौतीपूर्ण घोषणा में जान तभी आएगी अगर्चे उनकी पार्टी कर्नाटक में कुछ दम दिखा सकें। कांग्रेस अपने बूते पर किसी राज्य में बहुमत प्राप्त कर सकें, यह राहुल के लिए अपने नेतृत्व का सिक्का मनवाने की पहली शर्त है। कांग्रेस में उनका नेतृत्व बेरोकटोक चल सकता है, क्योंकि उस पार्टी की मानसिकता ही सामंतवादी और परिवारवादी हो चुकी है। लेकिन सन 2019 के चुनावों के लिए जब कांग्रेस दूसरे दलों के साथ साझेदारी करना चाहती है ऐसे में अपने नेतृत्व गुण निर्विवाद रूप से साबित करना राहुल के लिए महत्वपूर्ण है। उनके राजनीतिक अस्तित्व की यह पहली कसौटी है। और उनकी पाटी इस मामले में अब तक कोरी रही है।





इस वर्ष कर्नाटक के बाद छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदी राज्यों में भी चुनाव है। लेकिन वैसा दमदार प्रदर्शन करने से पहले कांग्रेस को कर्नाटक की परीक्षा पास करनी होगी। राहुल के कांग्रेस उपाध्यक्ष रहते कांग्रेस 10 से अधिक राज्यों में चुनाव हार गई है। उनके कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद भी हार का सिलसिला जारी है। भाजपा "दागी विरासत, सामंती सियासत" का नारा देकर कांग्रेस को घेरती आई है। हाल के दिनों में प्रधानमंत्री मोदी ने इस संघर्ष को नामदार बनाम कामदार का रूप दिया है। इसलिए कर्नाटक के चुनावों पर राहुल गांधी और कांग्रेस का भावी निर्भर है। यह वह राज्य है जो राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है और कांग्रेस के पाले में एकमात्र बड़ा राज्य है। अगर भाजपा वहां जीतती है तो उसके दक्षिण में विजय अभियान में रास्ते खुले हो जाएंगे। अगर कांग्रेस वहां अपनी सत्ता कायम रखती है तो माना जाएगा, कि वह एक गंभीर राजनीतिक खिलाड़ी है जिससे 2019 में उसकी चुनौती को भी गंभीरता से लिया जाता है। अगर सत्ता उसके हाथ से गई तो तृणमूल कांग्रेस और एनसीपी जैसे दल उस पर हावी हो जाएंगे। तृणमूल की ममता बैनर्जी ने तो वैसे भी कांग्रेस को 1-1 सीट बंटवारे का प्रस्ताव दिया है। राहुल गांधी ने अब तक ऐसा कुछ भी नहीं किया है, कि ये सारे क्षत्रप उनके झंड़े के तले एकत्र आएंगे।
कांग्रेस ने यह मुगालता पाल रखा है, कि प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार के विरुद्ध लोगों में आक्रोश है और वह उसे अपने आप सरकार तक पहुंचा देगा जिससे युवराज स्वयं राजा बन जाएंगे। जबकि भाजपा और कांग्रेस दोनों से समान दूरी बनाए रखना चाहनेवाले अन्य विपक्षी दल तीसरे मोर्चे या फेडरल फ्रंट की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने पहले ही बिना लाग-लपेट के बता दिया है, कि राहुल के तहत काम करने में उन्हें जरा भी रूचि नहीं है। इसलिए राहुल को यह सुनिश्चित करना होगा, कि उनकी पार्टी 201 9 में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरती है। पिछले कुछ वर्षों में उनके ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए यह न के बराबर लगता है।
राहुल की मंशा पर पानी फेरनेवालों में एनसीपी प्रमुख शरद पवार सबसे आगे है। पवार से जब पूछा गया कि राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के सपने पर उनकी क्या राय है तो उन्होंने कहा कि अभी यह कहना सही नहीं, किसकी कितनी सीट आएंगी। यह तो अभी कोई पक्के तौर पर नहीं बोल सकता है। पवार मानते है, कि अगर 2019 में गठबंधन की सरकार बनी तो कांग्रेस के समर्थन से वह पीएम की कुर्सी पर दावेदारी जता सकते हैं। और बाकी के क्षत्रप भी कमोबेश यही मानते है।
बहरहाल, राहुल ने अपने पत्ते तो खोल दिए है। अब आगे देखना है, कि कर्नाटक का ऊंट किस करवट बैठता और युवराज का अभियान किस दिशा में बढ़ता है।

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