Thursday, April 12, 2018

मार्क ज़करबर्ग - पकड़ा गया वह चोर


अमेरिकी सीनेट की वाणिज्य और न्यायपालिका समितियों की संयुक्त सुनवाई से पहले  फेसबुक के संस्थापक मार्क  ज़करबर्ग ने करोड़ों उपयोगकर्ताओं से माफी मांग ली। इस युवा अरबपति के लिए निश्चय ही यह एक शर्मिंदगी का पल होगा। इस माफी के बाद फेसबुक के खून के लिए प्यासी कई आत्माओं को तत्कालिक शांति मिल गई होगी।


फेसबुक के संस्थापक ने अपने चिर परिचित परिधान टी-शर्ट और जीन्स का त्याग कर बिजनेस सूट को अपनाया इसी से उनकी गंभीरता का पता चल जाता है। यह केवल एक सतही बदलाव नहीं था, बल्कि यह एक मनोदशा और मानसिकता के बदलाव का चिन्ह भी था। जहां टी-शर्ट और जीन्स युवा ऊर्जा और उत्साह का प्रतीक है वहीं बिजनेस सूट गंभीरता और उत्तरदायीत्व का प्रतीक है। सुनवाई के समय यह परिधान कर ज़करबर्ग ने दिखा दिया, कि वे केवल इंटरनेट पर चलनेवाली किसी नवोन्मेषशाली वेबसाइट के खिलंदड़ मालिक नहीं है, बल्कि एक विश्वव्यापी साम्राज्य के मालिक है जो अपनी जिम्मेदारी भली-भांति समझता है।


ज़करबर्ग ने माना है कि कैंब्रिज एनालिटिका मामले में फेसबुक से हुई बड़ी गलती हुई है। ज़ुकरबर्ग ने एक लिखित बयान में कहा है कि वह निजी डाटा की गोपनीयता की सुरक्षा और इसके दुरूपयोग को रोकने में सोशल नेटवर्क की विफलता के लिए जिम्मदारी स्वीकार करते हैं। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ सालों में सोशल मीडिया के सदस्यों के डाटा के दुरूपयोग को रोकने के लिए सोशल मीडिया नेटवर्क ने पर्याप्त प्रयास नहीं किया।


लंदन की कैंब्रिज एनॉलेटिका कंपनी पर कथित रूप से फेसबुक के सदस्यों के डाटा का दुरूपयोग करने का आरोप है।कैम्ब्रिज एनालिटिका की मूल कंपनी एससीएल और डॉ. अलेक्जेंद्र कोगान ने डेटा एकत्र करने की इस ऐप को विकसित किया था। व्यक्तिगत डेटा की चोरी होने के दावों के बाद ये घोटाला सामने आया । इसका दुरुपयोग अमेरिकी राष्ट्रपति अभियान और यूरोपीय संघ के जनमत संग्रह के परिणाम को प्रभावित करने के लिए किया गया था।


इस सिलसिले में ज़करबर्ग ने सीधे तौर पर कंपनी की गलती स्वीकार करते हुए कहा है, कि यूजर्स के डेटा की सुरक्षा करने की जिम्मेदारी हमारी है तथा ग्राहकों के डेटा की सुरक्षा करना उनकी जिम्मेदारी है। ज़करबर्ग ने कहा कि यह फ़ेसबुक और उन लोगों के साथ भी विश्वासघात है, जो अपनी जानकारियां हमारे साथ शेयर करते हैं।
अब ज़करबर्ग ने जो कुछ कहा है उससे सभी संतुष्ट हो यह ज़रुरी नहीं है। इसमें कोई शक नहीं, कि निजी डेटा की सुरक्षा एक अहम मुद्दा है। उपयोगकर्ताओं की व्यक्तिगत जानकारी के बदले में सामाजिक संपर्क प्रदान करनेवाला एक नया तंत्र हाल के वर्षों में उभरकर आया है। इसमें जो कंपनियां भागधारक है उनके छिपे इरादें समझना हर एक के बस की बात नहीं है। खासकर चुनावों के लिए मतदाताओं को लक्षित कर उनके मतों के रूझान को प्रभावित करना।


लेकिन यहां सवाल यह है, कि जिस हमाम में सब नंगे है उसमें केवल ज़करबर्ग को निशाना क्यों बनाया जा रहा है? क्या इसलिए कि फेसबुक के चलते ही अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की जीत होने का सिद्धांत लिबरलों ने मन ही मन पक्का मान लिया है?



गुगल से लेकर एप्पल तक हर कंपनी आपके डाटा का उपयोग करने पर तुली है। यहां हर कोई आपके वर्तमान को कब्ज़े में लेकर भविष्य को आकार देने का प्रयास कर रहा है। गुगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ऐरिक श्मिट ने सन् 2007 में फाइनेंशियल टाईम्स के साथ हुए एक इंटरव्यू में कहा था, कि “हमारा लक्ष्य गुगल उपयोगकर्ताओं को उस योग्य करना है कि वह ‘कल मुझे क्या करना चाहिए?’ और ‘मुझे कैसा काम करना चाहिए?’ जैसे प्रश्न पूछ सकें।” आज गुगल एसिस्टंट जैसे एप के जरिये यह लक्ष्य काफी हद तक साध्य किया जा चुका है।


श्मिट ने 2010 में वॉल स्ट्रीट जर्नल से एक अन्य साक्षात्कार में कहा था, “मुझे वास्तव में लगता है कि ज़्यादातर लोग यह नहीं चाहते कि गुगल उनके सवालों का जवाब दे, बल्कि वे चाहते हैं कि गुगल उन्हें यह बताए कि उन्हें आगे करना क्या है।” अब अगर उपयोगकर्ता की भूतकालीन और वर्तमानकालीन जानकारियां गुगल के पास होगी ही नहीं तो वह भविष्य की जानकारी क्या खाक देगा?


इसी ऐरिक श्मिट ने दिसम्बर 2010 में कहा था, कि “अगर आपके पास कुछ ऐसा है जो आप किसी और से जताना नहीं चाहते, तो शायद पहले स्थान में आपको ही वह नहीं करना चाहिए। अगर आपको वास्तविकता में वैसी गोपनियता चाहिए, तो फिर सच्चाई यह है कि खोज इंजन — गूगल सहित — कुछ समय के लिए वह जानकारी बनाए रखते हैं और यह महत्त्वपूर्ण है, उदाहरण के लिए, क्योंकि संयुक्त राज्य अमेरिका में हम सब पैट्रियट एक्ट (देशभक्त अधिनियम) के अधीन हैं और यह सम्भव है कि वह सब जानकारी अधिकारियों को उपलब्ध करायी जा सकती है।”


निजता के अधिकारों के लढ़नेवाले संगठन प्राइवेसी इंटरनेशनल ने गूगल को “गोपनीयता का प्रतिपक्षी” की संज्ञा दी है। क्या कोई गुगल के बिना इंटरनेट का उपयोग करने की आज सोच सकता है?


यह साइबर दुनिया है, यहां आपका डाटा ही असली मुद्रा है। इस मुद्रा का आदानप्रदान किए बिना यह बाजार चल ही नहीं सकता। इसमें से काफी सारी मुद्रा चोरी से ही आती है, यह बात साइबर दुनिया में बाज़ार लगानेवाला हर शख्स जानता है। ज़करबर्ग की गलती इतनी है कि उसका सिक्का ज्यादा चलता था और उसकी चोरी पकड़ी गई।

Wednesday, April 11, 2018

राहुल गांधी और दलितों का 'महाभोज'


मन्नू भंडारी की एक प्रसिद्ध कृति है 'महाभोज'। किसी दलित व्यक्ति की मृत्यू, उस पर खड़ा उठनेवाला राजनैतिक बंवड़र और राजनैतिक दलों की गुलाटियां, इनका गजब का चित्रण भंडारीजी ने किया है। इस पुस्तक का सरसरी पठन करनेवाला भी हतप्रभ रह जाता है, कि किस तरह लेखक (लेखिकाएं) समय से आगे जाकर देख सकती है।


उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग में स्थित सरोहा नामक गांव में विधान सभा की एक सीट के लिए चुनाव सर पर है। बिसेसर तथा बिसू नामक एक कार्यकर्ता दलित की हत्या होती है। बिसेसर हरिजन बस्ती के अपने लोगों न्याय दिलाने के लिए लढ़नेवाला व्यक्ति है। उसकी मौत के बाद उसका दोस्त बिंदेश्वरी उर्फ़ बिंदा उसके प्रतिरोध की विरासत आगे ले जाना चाहता है। लेकिन बिंदा को भी राजनीति और अपराध के चक्र में फांसकर जेल में डाला जाता है। उसके बाद एक राजनीति की बिसात पर बिसात बिछती जाती है और सत्ताधारी वर्ग, सत्ता प्रतिपक्ष, मीडिया और नौकरशाही जैसे कई खिलाड़ी जुड़ते जाते है। यह एक नंगी तस्वीर है, कि किस तरह शासन और तंत्र मिलकर दलितों, गरिबों को कुचलते है। उनका हक मारते है और उन्हें न्याय दिलाने के नाम पर अपनी जेबें भरते है।



जनवरी 2016 में हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला ने आत्महत्या ने की, तबसे जो माहौल लिबरलों और मीडिया ने बनाया है वह बरबस 'महाभोज' की याद दिलाता है। सेकुलरिज्म का दम भरनेवाले दलों और वाम-झुकाववाली मीडिया ने कोई कसर नहीं छोड़ी, कि भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में दलितों पर अत्याचार चरम पर है और यह एक पूर्णतः जातिवादी शासन है। ऐसे लोगों के लिए यह बताना उचित होगा, कि मन्नू भंडारीजी का यह उपन्यास सर्वप्रथम 1979 में रचित था। यह वर्ष वह है जब भाजपा का वर्चस्व छोड़ो, उसका अस्तित्व भी नहीं था। वह अपने पूर्ववर्ती चोले यानि जन संघ के रूप में भी नहीं थी। वह जनता पार्टी नामक एक कुनबे का हिस्सा थी जिसमें हर रंग के दल शामिल थे।


स्पष्ट है, कि दलितों पर अत्याचार हमारे देश का दुःखद वास्तव है। इसमें कांग्रेस और भाजपा के शासन में फर्क करना उचित नहीं होगा। बल्कि सच्चाई यह है, कि अगड़ी जातियों के वर्चस्व के कारण कई बार कांग्रेस ने दलित अत्याचार में बड़ी भूमिका निभाई है। जिस समय भंडारीजी का 'महाभोज' आया था, लगभग उसी समय महाराष्ट्र में दलित पैंथर का उदय हुआ था। राज्य के कई गांवों में दलितों पर हुए अत्याचार के खिलाफ एक उग्र विद्रोह के रूप में यह आंदोलन खड़ा हुआ था। पैंथर कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर दलित बस्तियों से भेंट करते और अत्याचारियों से दो हाथ करते।


इस सारे इतिहास से बेखबर होकर, या कहें कि उसकी तरफ आंखें मूंदकर, दलितों पर लगातार हो रहे अत्याचार के मुद्दे पर कांग्रेस ने देशव्‍यापी उपवास शुरू किया। उसमें जो फजीहत उसकी हुई है वह बिल्कुल स्वाभाविक है। जिसका अपना गिरेबां साफ नहीं वह और को क्या उपदेश देगा?


धरना और उपवास के पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एक रेस्तरां में खाना खाते हुए देखे गए। रेस्तरां में कांग्रेस नेताओं की छोले भटूरे खाती हुई तस्वीर भी वायरल हुई। कांग्रेस नेता अरविंदर सिंह लवली ने तो बाकायदा मान लिया, कि ये तस्वीरें सोमवार सुबह से पहले की है। उससे पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को लेकर भी कांग्रेस को शर्मिंदगी उठानी पड़ी। यह उपवास एक उपहास बनकर रह गया और इसके लिए सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस जिम्मेदार है।


कांग्रेस की इस नौटंकी ने अगर कुछ साबित किया है तो यह, कि वह अभी भी दिखावे की राजनीति औरलोगों की भावनाओं से खेलने में अभी भी नहीं हिचकिचाती है। राजनीतिक दल इस खेल में माहीर तो थे ही, वे अब बेशर्मी की हदें भी पार कर गए है। एससी-एसटी एक्ट पर जो फैसला दिया है वह उच्चतम न्यायालय ने दिया है। लेकिन राहुल गांधी इसका ठिकरा भाजपा के सर पर फोड़ रहे है।वैसे कांग्रेस यह भी बताएं, कि आखिर वह इतनी ही दलित हितैषी थी तो उसके 40 वर्षों के शासन के पश्चात् इस एससी-एसटी एक्ट को 1989 में बनाने की जरूरत ही क्यों पड़ी?
तात्पर्य यह, कि कांग्रेस को सचमुच दलितों की चिंता होती तो इस 'महाभोज' का आयोजन नहीं होता।


यह तो बस कर्नाटक विधानसभा चुनाव की कार्यशाला और सन 2019 के आम चुनाव का अभ्यास है, बस!