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Monday, February 3, 2020

टल गया कूपमंडूकों का 'कुंभाभिषेकम'

File:Le temple de Brihadishwara (Tanjore, Inde) (14354574611).jpg
हमारे देश में तमिलनाडू में तंजावुर बृहदेश्वर मंदिर भारत के सबसे पुराने मंदिरों में से एक माना जाता है। भोसले राजवंश सरफोजी राजे ने प्रसिद्ध बृहदेश्वर मंदिर में दुनिया का सबसे बड़ा शिलालेख उकेरा है। यह बृहदेश्वर मंदिर पहले चोल राजा ने बनवाया था। इसे राजाराजेश्वरम मंदिर या पेरुवुडैयार मंदिर भी कहा जाता है। कावेरी नदी के दक्षिणी तट पर स्थित यह मंदिर शिव को समर्पित है और द्रविड़ (दक्षिणी) वास्तुकला का अत्युत्तम उदाहरण है। इसे दक्षिण मेरू भी कहते है। तमिल राजा राजराजा चोल द्वारा ईसाई सन  1003 और 1010 के दौरान निर्मित इस मंदिर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी है। इस मंदिर का महाकुंभाभिषेकम समारोह अत्यंत पवित्रमाना माना जाता है। तमिलनाडु के साथ-साथ देश भर के भक्तों के लिए इस आयोजन का बहुत महत्व है। यह समारोह इस वर्ष 6 फरवरी को है। लेकिन इसी समारोह को कुछ संकुचित लोगों की नज़र लगी और भाषा का बहाना बनाकर उसे खट्टा करने का प्रयास हुआ। सौभाग्य से मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा विवेकपूर्ण भूमिका अपनाने के कारण यह मुद्दा आग पकड़ते-पकड़ते रह गया। एक मामूली विषय पर समाज गुटों में परिवर्तित होने का संकट टल गया।  
हिंदुओं के महान मंदिर तमिलनाडु की शान हैं (कुछ सबसे बड़े ईसाई चर्च भी तमिलनाडु में हैं )। द्रविड़ आंदोलन के नाम पर नास्तिकों ने चाहे जितना भी परेशान किया हो, आज भी जनमानस पर इन मंदिरों का प्रभाव कायम है। देश के अन्य हिस्सों की तरह ही तमिलनाडु के मंदिरों में भी पूजा-अर्चना संस्कृत में होती थी। लगभग छह - सात दशकों पहले उपजे हुए द्रविड़ आंदोलन की दृष्टि में संस्कृत उत्तर भारत और अंततः आर्यों की भाषा है। इसलिए, द्रविड़वादियों का हठ था, कि संस्कृत या हिंदी का सभी स्तरों पर सफाया कर दिया जाना चाहिए और मंदिरों को भी इसमें शामिल किया गया। राज्य में कई मंदिर, विशेष रूप से सरकारी नियंत्रणवाले मंदिर, इसकी चपेट में आए और तमिल वहाँ दैनिक पूजा की भाषा बनी। हालांकि तंजावुर मंदिर जैसे मंदिर अपवाद बने रहे और इसका कारण यह है, कि इन मंदिरों का एक लंबा इतिहास है।
राजराजा चोल 
स्वयं तंजावुर मंदिर का इतिहास, जैसा कि ऊपर कहा गया है, कम से कम 1000  वर्ष पुराना है। चोल, चेर और पांड्य इन तमिल राजाओं का इतिहास गौरवमयी रहा है। ये सभी राजा संस्कृत को उदार प्रश्रय देनेवाले थे, यह यहाँ महत्वपूर्ण है। उनके तमिल अस्तित्व को संस्कृत से निकटता के कारण कोई बाधा नहीं पहुंची। इसलिए, उनके द्वारा बनाए गए मंदिर में संस्कृत मंत्रपठन की परंपरा कायम रही। वही परंपरा तथाकथित द्रविड़वादियों को चुभ रही थी। इसलिए किसी वकील ने मद्रास उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर मांग की कि तंजावुर के इस समारोह में केवल तमिल भाषा में ही मंत्रपठन हो। इस मामले पर उच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह निर्णय सुनाया। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि महाकुंभाभिषेकम के समारोह के दौरान, तमिल और संस्कृत दोनों भाषाओं के मंत्र कहे जाएं।
इसमें आनंददायक बात यह है, कि इस अवसर पर भाषा का बहाना बनाकर एक समुदाय में अलगाव पैदा करने का प्रयास असफल तो हुआ ही, साथ ही आम जनता से भी इन प्रयासों को समर्थन नहीं मिला। राज्य में विरोधी डीएमके पार्टी ने पहले 'केवल तमिल' की मांग की थी। उन्हें वाको जैसे नेताओं का समर्थन प्राप्त हुआ। दूसरी ओर, सत्ताधारी अन्ना द्रमुक पार्टी ने दोनों भाषाओं में मंत्रोच्चारण करने के पक्ष में मत दिया।
अब न्यायालय के आदेश के बाद भी नाम तमिळर कट्चि पार्टी के नेता सीमान जैसों ने 'अपनी ही सही' करने का पैंतरा लिया। दोनों भाषाओं में मंत्रोच्चारण अगर होना हो तो भी पहले मंत्रोच्चारण तमिल में ही हो, यह मांग उन्होंने की। हालांकि उसको समर्थन नहीं मिला। विद्वानों और सामान्य भक्तों ने इस ओर संकेत किया, कि इससे पहले महाकुंभाभिषेकम समारोह पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि के सत्ताकाल में (1997 में) हुआ था। उस अवसर पर इस मंदिर में वैदिक पंडितों की संस्कृत भाषा में मंत्रोच्चारण के साथ ही समारोह संपन्न हुआ था। करुणानिधि ने उसे रोका नहीं। चेन्नई मयिलाडुदुरै, रामेश्वरम, मदुरै  और कांचीपुरम जैसे प्रसिद्ध शिव मंदिरों में कुंभाभिषेकम संस्कृत भाषा में ही होता है। हिंदू परिवारों में भी जाप किया जाता है। इस पर कोई आपत्ति नहीं करता। पूजा और आरती के बाद तमिलनाडु में तिरुवासकम गाने की प्रथा है। यह स्तोत्र तमिल में ही।
परंपरावादियों की ओर से एक और तर्क रखा गया, कि तमिल भाषा के विकास का दावा करनेवाले सब लोग स्वयं बड़े हुए। दिनमलर नामक समाचारपत्र में प्रकाशित एक लेख में कहा है, कि मस्जिदों में अरबी में प्रार्थना होती है और चर्च में अंग्रेजी प्रार्थना होती है। वहां जाकर कहो, 'तमिल में उपासना करो'। यह कुंभ समारोह आगम शास्त्र के अनुसार होता है। इसमें पूजा कैसे हो और किस प्रकार की हो, इसका मार्गदर्शन है। मंदिरों में हजारों वर्षों से इसी के अनुसार पूजा की जाती है। एक बात हमें समझनी चाहिए, कि पूजा पद्धति और उपासना अलग-अलग हैं। दि. वे. चंद्रशेखर शिवाचार्यर नामक पंडित ने मत व्यक्त किया है, कि हम परमेश्वर की उपासना करते है वह किसी भी भाषा में हो सकती है। लेकिन पूजा पद्धति के कुछ नियम है और उनका पालन किया जाना चाहिए। उन्होंने यह जानकारी भी दी है, कि जिन लोग को मंदिर में तमिल में पूजा करना चाहते हैं उनके लिए पूजारी को तमिल में पूजा करवाने का नियम है। लेकिन 99% लोग तमिल में पूजा करने के लिए नहीं कहते हैं; वे संस्कृत की मांग करते है।
संस्कृत की ओर से मत रखनेवालों की एक और आपत्ति है, कि बृहदेश्वर मंदिर में तमिल को सम्मान मिलें इसके लिए कमर कसनेवाले सारे लोग नास्तिक है। तमिल के लिए मैदान में उतरनेवाले सारे लोग भगवान को नकारनेवाले हैं। लोग ईश्वर में विश्वास करते हैं और भाषा उनका अधिकार है। लेकिन इन दोनों को रौंदकर ये लोग अपनी ही सही करवाने का प्रयास कर रहे हैं। इस का मतलब है, कुछ नेता और प्रसिद्धी के लिए बेताब होनेवाले कुछ तमिल आंदोलक तिल का ताड़ बना रहे है। 
उच्च न्यायालय ने इस विवाद को चाय की प्याली में उभरा हुआ तूफान बना  दिया। लेकिन इससे एक और बात स्पष्ट होती है। वह है क्षेत्रीय सीमाओं को पार करने की संस्कृत की शक्ति। चोल राजराजा प्रथम वास्तव में सम्राट थे। उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों, श्रीलंका, मालदीव और पूर्वी एशिया के कुछ हिस्सों पर उसने सन 985 और 1014 के बीच शासन किया। राजराजा चोल ने जब बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण किया, तो उसका राज्य वर्तमान तमिलनाडु, केरल, आंध्र, कर्नाटक और ओडिशा तक फैला था। उसके पुत्र राजेंद्र चोल ने तो बंगाल में भी अपने साम्राज्य का विस्तार किया था। यानी यह राजा केवल तमिल लोगों पर नहीं बल्कि करोड़ों गैर – तमिल लोगों पर राज्य करता था। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इन सबसे संवाद करने के लिए चोल राजाओं को संस्कृत भाषा सही लगी! एक तरह से संस्कृत उनके लिए राष्ट्रीय भाषा थी और इसलिए उनके समय से ही इस मंदिर में संस्कृत मंत्रपठन जारी है। न्यायालय ने इस मामले का संज्ञान लिया और तमिल की गरिमा को ध्यान में रखते हुए दोनों भाषाओं में समारोह करने की अनुमति दी। इस बहाने कूपमंडूकों का कुंभाभिषेकम तो टल गया, इतना काफी है!

Monday, January 1, 2018

आत्मैव रिपुरात्मनः?

कोरेगाव भीमा येथील विजयस्तंभ आणि ‘शौर्य दिन’ साजरा करण्यावरून बराज गाजावाजा करण्यात येत आहे. त्याची कठोर चिकीत्सा करणारा लेख स्नेही राजेश पाटील यांनी लिहिला आहे. त्यांच्या परवानगीने तो येथे प्रकाशित करत आहे.
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दि. १ जानेवारी रोजी महाराष्ट्रातील, पुण्याजवळ ‘कोरेगाव भीमा’ येथे ‘शौर्य दिन’ साजरा करण्याचे काही सामाजिक संस्थांकडून योजले आहे असे कळते! त्यातील एका निवेदनात “२०० वर्षांपूर्वी निर्धाराने भीमा कोरेगावच्या युद्धात महार सैनिकांच्या नेतृत्त्वात इतर जातधर्मीय सैनिकांनी पेशवाई संपवली होती” असा उल्लेख आहे!! यात २०० वर्षे म्हणजे सन १८१८, हे युद्ध खरे तर परकी ब्रिटिश सत्ता व स्वदेशी हिंदुस्थानी मराठेशाही यांच्यात झाले होते व त्यात ब्रिटिशांच्या बाजूने जसे एतद्देशीय सैनिक होते तसेच मराठेशाहीच्या बाजूने देखील एतद्देशीय सैनिक लढले होते!! ही काही ‘दलित/बहुजन’ व ‘ब्राह्मण’ यांच्यातील लढाई नव्हती!! ‘


पेशवे’ म्हणजे ‘पंतप्रधान’ हे पद स्वतः छ. शिवाजी महाराजांनी निर्माण केले होते!! ‘पेशवे’ हे मराठा छत्रपतींचे पंतप्रधान होते! म्हणजेच ते मराठेशाहीचे प्रतिनिधित्व करत होते!! आणि युद्धातील जय – पराजय हा त्या युद्धात उतरणाऱ्या, एकमेकांच्या विरुद्ध लढणाऱ्या दोन पक्षातील सर्वोच्च दायित्व असलेल्या राजकीय सत्तांचा असतो!! म्हणून या युद्धातील जय वा पराजय याचे श्रेय/दोष ‘ब्रिटिश’ किंवा ‘मराठेशाही’ यांना देण्यात यायला हवे! व तेच ‘खरे’ इतिहासकार करतात!! (आणि या युद्धात तर तत्कालीन छत्रपती देखील होते असा देखील उल्लेख सापडतो!!) पण इथे मात्र एका बाजूला ‘दलित/बहुजन’ व दुसऱ्या बाजूला ‘पेशवे’ – म्हणजेच – ‘ब्राह्मण’असा जातीय रंग या घटनेला देण्यात येत आहे, असे या संस्थांच्या निवेदनातील भाषेवरून वाटत नाही का?


आणखी एक प्रश्न असा विचारावासा वाटतो कि, हाच जातीय तर्क जर वापरायचा झाला तर मग इतर घटनांच्या बाबतीत देखील तो लावायला हवा!! तो लावायची तयारी या संस्थांची आहे का? उदा. ब्रिटिशांच्या ‘जनरल डायर’ने पंजाब मधील जालियनवाला बाग येथे अनेक निरपराध हिंदुस्थानींना मारले होते!! त्यात डायरच्या ‘हुकुमा’वरून गोळ्या झाडणारे बहुसंख्य भारतीयच होते — त्यात दलित/बहुजन देखील असतील – व मरणाऱ्यात बहुसंख्येने शीख देखील असतील — आणि तसे जर असेल व या संस्थांच्याच तर्काने जायचे झाले तर ‘दलित/बहुजन यांनी निरपराध हिंदुस्थानींना गोळ्या घालून मारले’ असे म्हणण्यासारखे होणार नाही का? म्हणून हा तर्क किती घातकी व विषारी आहे याचा विचार सर्वांनी केला पाहिजे!!


या संस्था एकीकडे डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, छ. शिवाजी महाराज यांचे देखील नाव घेतात… यावरून एक आठवण करून द्यावीशी वाटते ती ही कि, माझ्या माहितीप्रमाणे बडोद्याच्या सयाजीराव गायकवाडांना छ. शाहू महाराजांनी डॉ. आंबेडकरांची शिफारस केली होती व त्या बळावर डॉ. बाबासाहेब हे देशातील व पुढे अमेरिकेत जाऊन पुढील शिक्षण घेऊ शकले व डॉक्टरेट मिळवू शकले!! त्यानंतर त्यांना नोकरी देखील बडोद्याच्या गायकवाड महाराजांनी दिली!! बडोद्याचे गायकवाड घराण्याचे राज्य हे छत्रपतींच्या अधिपत्याखालील अखिल मराठा साम्राज्याचा भाग असेलेल्या मराठेशाहीचेच अभेद्य अंग आहे! तसेच ‘दलितांना’ या देशाच्या इतिहासातील ‘पहिले आरक्षण’ मराठेशाहीचे वंशज, कोल्हापूरचे छ. शाहू महाराज यांनीच दिलेले होते!! म्हणजे, मराठेशाहीचे छत्रपतींच खरे ‘दलित मित्र’ होते असा होत नाही का? आणि पेशवे तर त्याच मराठा साम्राज्याचे म्हणजेच मराठेशाहीचे पंतप्रधान, म्हणजेच प्रतिनिधी होते!! याचा अर्थ, ‘पेशव्यांना’ विरोध म्हणजे मराठेशाहीलाच विरोध नव्हे काय? म्हणजे, आताचे काही दलित हे अंतिमतः ‘दलित मित्र’ मराठेशाहीलाच विरोध करताहेत असा त्याचा अर्थ होत नाही का? ही प्रतारणा नव्हे का?


आणखी एक मुद्दा मांडावासा वाटतो – तो म्हणजे या संस्था या घटनेला ‘जातीअंताचं प्रतीक’ असे म्हणताहेत !! याविषयी असे सांगावेसे वाटते कि, मराठेशाहीच्या सैन्यात देखील दलित होते हे काही वेगळे सांगायची गोष्ट नाही ! पण ते सर्व ‘मराठे’ म्हणून लढले व देशाला परकीय सत्तांपासून वाचविले!! ‘मराठा’ म्हणजे, समर्थ रामदास स्वामी यांनी ‘मराठा तितुका मेळवावा, महाराष्ट्र धर्म वाढवावा’ या संदेशातून – ‘शौर्य व वीरश्रीने ओतप्रोत, परकीय सत्तांशी लढून स्वदेशाचे व स्वधर्माचे रक्षण करणारा वीर’ म्हणजे ‘मराठा’ अशी ‘गुणवाचक’ व्याख्या केली आहे! ती ‘जातीवाचक’ नव्हे! म्हणजेच मराठेशाहीचे प्रतिनिधी असलेल्या पेशव्यांच्या सैन्यातील ‘दलित हे ‘मराठे’ म्हणून होते व ब्रिटिशांच्या सैन्यातील दलित हे ‘महार’ म्हणून होते आणि या संस्था म्हणतात त्याप्रमाणे ब्रिटिशांनी जर फक्त ‘दलित’ म्हणून दलितांना वागविले तर यात जातीयवाद कोण करत आहे? यातील कोणते संबोधन जातीवाचक आहे? यातील कोणत्या संबोधनाने ‘जातीअंत’ होऊ शकेल?


पुढील मुद्दा असा आहे कि – काही इतिहासकारांच्या मते ‘भीमा कोरेगावची लढाई हि काही अंतिम लढाई नव्हती !… त्यात मराठ्यांनी युद्ध नीतीचा भाग म्हणून थोडे युद्धाला तोंड फोडले व शत्रूला आपला पाठलाग करायला लावून खिंडीत गाठण्याचा देखील त्यांचा प्रयत्न असू शकतो! उदा. धर्मगड (बहादूरगड) ची लढाई मराठ्यांनी अशाच प्रकारे जिंकली होती!! तसेच, सर्व हिंदुस्थान जिंकून काढणारा औरंगजेब देखील मराठ्यांच्या याच नितीमुळे हैराण होऊन शेवटी याच महाराष्ट्रात गाडला गेला!! म्हणून ब्रिटिशांनी जर ‘कोरेगाव भीमा येथे मराठ्यांचा पराभव झाला’ असे लिहून ठेवले असेल तर हे विधान एकतर्फी होत नाही का?


तसेच, या संस्थांच्या एका पदाधिकाऱ्याने “मुस्लिमांनी सर्व शक्ती लावून (हिंदूंमधील)बहुजनांना ब्राह्मण धर्मापासून मुक्त केले पाहिजे!” अशा अर्थाचे संदेश दिले आहेत!! याचा अर्थ,हिंदूंना मुसलमान करण्याचा हा डाव नाही का? आणि असल्या कारवायांपासून आपण सावध राहिले पाहिजे अशी भूमिका दलितांसह सर्व बहुजनांनी घ्यायला नको का? आता, गिरिजन, वनजन, आदिजन, बहुजन, ब्राह्मण, क्षत्रिय, शैव, वैष्णव, शीख, जैन, बौद्ध इत्यादींसह सर्व हिंदूच आहेत!!


ब्राह्मणीधर्म हे विशेषण परकीय सत्तांनी हिंदूंमध्ये फूट पाडण्यासाठी आणले आहे असे म्हटले जाते! काही अभ्यासक विचारवंतांच्या मते, काही परकी पांथिक शक्ती, ‘इतर देशाशी प्रत्यक्ष युद्ध न करता, त्या देशातील समाजात अंतर्गत फूट पाडून यादवी माजविली कि अशा फूट पाडलेल्या समाजाला व त्याद्वारे राष्ट्रांना सहजपणे ताब्यात घेता येते’ अशा प्रकारच्या नीतीचे अवलंबन करतात, म्हणजे या दुहीमुळे स्वतः समाजच स्वतःचा शत्रू होतो!! आणि देश जर प्रगतीपथावर न्यायचा असेल तर आपल्यातील ‘बंधुभाव’ कसा दृढ होईल ते पाहिले पाहिजे- भगवद्गीतेतील आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः हे वचन एकट्या फक्त अर्जूनासाठीम्हटलेले नसून आपणा सर्वांसाठी आहे!! त्याला भारतीय समाज बळी पडू नये याची काळजी सर्वांनी घ्यायची आवश्यकता आहे!


शेवटचा व सर्वात महत्वाचा मुद्दा म्हणजे, अनेक लोक हा लेख वाचल्यावर म्हणतील की, ‘आम्ही त्या स्मारकावर जाऊ नये का?’ – मी म्हणेन ‘अवश्य जावे’ पण, स्मरण आणि वंदन – जे या मातृभूमीसाठी लढले त्यांचे करण्यासाठी!! या घटनेचे विश्लेषण एखाद्याने वरीलप्रमाणे केले तर ते चुकीचे असेल का?


राजेश पाटील

संदर्भ :
https://en.wikipedia.org/wiki/Battle_of_Koregaon
https://twitter.com/WamanCMeshram/status/937552308946182144
https://twitter.com/BMM2024/status/940453585422204929
https://twitter.com/WamanCMeshram/status/940153765318991872
https://twitter.com/BMM2024/status/937972490134888448

Thursday, August 16, 2007

कथा अमेरिकेच्या वर्तमानपत्रांची

"वॉल स्ट्रीट जर्नल' हे वर्तमानपत्र घेण्याचा प्रयत्न करून रुपर्ट मर्डोक यांनी एक नवा इतिहास लिहिला आहे. अमेरिकेच्या इतिहासात एखाद्या परकीय पत्रकार अथवा माध्यमसम्राटाचा यानिमित्ताने प्रथमच प्रवेश झाला आहे. (किमान एवढ्या मोठ्या प्रमाणावर तरी!) या निमित्ताने अमेरिकेच्या पत्रकारितेचा इतिहास चाळण्याची सहज इच्छा झाली.

अमेरिकेचे पहिले वर्तमानपत्र केवळ एका अंकापुरते निघाले होते, ही माहिती वाचून मला पहिल्यांदा धक्का बसला. "पब्लिक ऑक्‍युरेन्सेस बॉथ फॉरेन अँड डोमेस्टिक' हे अमेरिकेचे अनेक पाने असलेले, मुद्रित असे पहिले वृत्तपत्र. बेंजामिन हॅरिस याने हे चार पानांचे वृत्तपत्र काढले होते. त्याचा पहिला अंक काढताच सरकारने प्रकाशकाला अटक केली आणि अंकाच्या प्रती जाळण्यात आल्या. पत्रकारितेच्या मुक्त स्वातंत्र्याची ही सुरवात! वर्ष होते १६९०. त्यानंतरची मोठी घटना म्हणजे बेंजामिन फ्रॅंकलिन या मोठ्या नेत्याची पत्रकारितेची कारकीर्द. बेंजामिनचा भाऊ जेम्स फ्रॅंकलिन याने "न्यू इंग्लंड करंट' नावाचे एक वर्तमानपत्र काढले होते. त्यात ‘सायलेंस डूगुड’ या नावाने बेंजामिन याने काही लेख लिहिले. विशेष म्हणजे खुद्द जेम्स यालाही ही माहिती नव्हती! १७२८ मध्ये बेंजा मिन फिलाडेल्फियाला गेला व त्याने तेथे "पेनसिल्व्हानिया गॅझेट'ची जबाबदारी सांभाळली.

खऱ्या अर्थाने आजच्या वर्तमानपत्राचे पूर्वसुरी म्हणता येईल, असे वृत्तपत्र १८३५ मध्ये "न्यू यॉर्क हेरॉल्ड'च्या रूपाने आकाराला आले. जेम्स गॉर्डन बेनेट याने हे वृत्तपत्र काढले होते. वार्ताहरांना नियमित बिट देणारे आणि प्रत्यक्ष घटनास्थळी जाऊन माहिती घेणारे पहिले वर्तमानपत्र म्हणून याची नोंद आहे. देशात आणि परदेशात (युरोपमध्ये) प्रतिनिधी नेमून अमेरिकी वृत्तपत्रांच्या क्षेत्रात त्याने आगळे पाऊल टाकले. त्याचा प्रतिस्पर्धी "न्यू यॉर्क ट्रिब्यून' (स्थापना १८४१) यानेही इतरत्र आपल्या आवृत्या पाठविण्यास सुरवात केली. छपाईचा वेग वाढविणारे लिनोटाईप यंत्र वापरणारे हे पहिले वर्तमानपत्र. आज जगात माध्यम क्षेत्रांमध्ये अत्यंत प्रतिष्ठेचे समजले जाणारे ‘न्यू यॉर्क टाईम्स’ हे वृत्तपत्र १८५१ साली स्थापन झाले. जॉर्ज जोन्स आणि हेन्‍री रेमंड यांनी या वर्तमानपत्राची स्थापना केली. गुलाम गिरीच्या मुद्यावरून झालेल्या अमेरिकेच्या यादवी युद्धामुळे वर्तमानपत्रांना खरी ऊर्जा मिळाली. या काळात अमेरिकी वर्तमानपत्रांनी मोठी प्रगती केली. यावेळी अधिकांत अधिक बातम्या देण्याची वर्तमानपत्रांची गरज भागविण्यासाठी न्यू यॉर्कच्या सहा मोठ्या वर्तमानपत्रांनी एकत्र येऊन बातम्या पुरविणाऱ्या संस्थेची स्थापना केली. हीच ती आजची "असोसिएटेड प्रेस.'

डेव्हिड लिव्हिंग्स्टन हा धर्मप्रसारक आफ्रिकेत गेला होता. काही दिवसांनी त्याचा ठावठिकाणा कोणालाच कळेना झाला. त्याची बातमी देतानाच बेनेट याने हेन्‍री स्टॅनली याला डेव्हिडला शोधण्यासाठी पाठविले. हेन्‍रीने त्याला शोधूनही काढले. शोधपत्रकारितेची ही सुरवात मानण्यात येते.

अमेरिकेच्या वर्तमानपत्रसृष्टीत सर्वकाही चांगलेच होते, अशातला भाग नाही. "सिटीझन केन' हा चित्रपट माहितेय? अमेरिकेतील तत्कालिन वृत्तपत्रसृष्टीतील एक भारदस्त व्यक्तिमत्व विलियम रॅंडॉल्फ हर्स्ट याच्या जीवनावर हा चित्रपट आधारलेला आहे. हर्स्ट हा अगदी वादग्रस्त आणि नफेखोर व्यक्तिमत्वाचा माणूस होता. स्वतःचे वर्तमानपत्रे खपविण्यासाठी कोणत्याही थराला जाण्याची त्याची तयारी होती. "सिटीझन केन' हा चित्रपट त्याच्या जीवनावर आधारित असल्याची चर्चा चित्रपट निर्मिती अवस्थेत असतानाच सुरू होती. त्यामुळे हर्स्ट महाशय अस्वस्थ झाले असल्यास नवल नाही. त्याने या चित्रपटाच्या निर्मात्यांशी संपर्क साधला आणि चित्रपटाची सर्व रिळांची (मास्टर रिलसह) विल्हेवाट लावण्यासाठी मोठी रक्कम देऊ केली. मात्र निर्मात्यांनी त्याच्या या "ऑफरला' नकार दिला. मग साम आणि दामच्या मार्गाचे प्रयत्न निष्फळ झाल्यानंतर दंडाच्या मार्गाचा त्याने वलंब केला. आपल्या वर्तमानपत्रातील गॉसिप लिहिणारी पत्रकार लुएला पार्सन्स हिला त्याने याकामी लावले. लुएला पार्सन्स स्‌ टुडिओच्या अधिकारी आणि वितरकांना फोन करायची आणि त्यांच्या खासगी गोष्टी पेपरमध्ये छापण्याची धमकी देत असे.

हर्स्टच्या व्यावसायिक नीतिमत्तेवर १८९८ सालातील एक तार मोठा प्रकाश टाकते. स्वतःचे वर्तमानपत्र खपावे यासाठी हर्स्ट याला अमे रिका आणि स्पेनमध्ये क्‍युबाच्या मुद्द्यावरून युद्ध व्हावे, असे वाटत होते. "न्यू यॉर्क जर्नल' या त्याच्या मुख्य वर्तमानपत्रात यासंबंधी अतिरंजीत आणि भडक भाषेतील मजकूर प्रकाशित होई. स्पेनने केलेल्या अत्याचारांच्या कहाण्या छापण्यासाठी त्याने आपल्या वार्ताहरांना ठिकठिकाणी पाठविले होते. हे वार्ताहर खऱ्या खोट्या बातम्याही पाठवत असत. जे प्रामाणिक होते ते अशा बातम्या पाठवत नसत. त्यामुळे त्यांना वैयक्तिकरीत्या नुकसानही झाले. अशाचपैकी एक जण होता फ्रेडरिक रेमिंग्टन. क्‍यूबात गेल्यानंतर त्याने हर्स्टला खऱ्या परिस्थितीची कल्पना देणारी तार पाठविली.

" इथे युद्ध होणार नाही. मी परत येतो.'

हर्स्टने त्याला उलट तार केली, "तू तिथेच थांब. तू छायाचित्रे पाठव. मी युद्ध सुरू करतो.'

अन्‌ खरोखर हर्स्टने आपल्या बातम्यांच्या जोरावर युद्ध सुरू केलेही. मात्र वृत्तपत्र मालकांचे हे नमुने केवळ हर्स्टपुरतेच मर्यादीत नव्हते. "शिकागो ट्रिब्यून'चा मालक कर्नल रॉबर्ट मॅककॉर्मिक याने आपला फ्रान्समधील वार्ताहर विलियम शिरेर याला हुकूम दिला. काय दिला? तर नऊ वर्षांपूर्वी फ्रान्समधील एका शेतात मॅककॉर्मिकची हरवलेली दुर्बिण शिरेर याने शोधून काढावी. याच माळेतील आणखी एक मणी म्हणजे "इंटरनॅशनल हेरॉल्ड ट्रिब्यून'चा मालक जेम्स गॉर्डन बेनेट ज्युनियर. त्याने हट्टाने सतत २४ वर्षे आपल्या वर्तमानपत्रात हवामानाची एकच माहिती छापली. एकदा त्याने वर्तमानपत्राच्या कार्यालयात प्रवेश केल्यानंतर खोलीच्या उजव्या बाजूला उभे असणाऱ्या सर्व कर्मचाऱ्यांना कामावरून कमी केले.
(संदर्भ ः द युनिवर्सल जर्नलिस्ट ले. डेव्हिड रॅंडाल, प्रकाशन वर्ष २०००)

हर्स्ट याचा व्यावसायिक प्रतिस्पर्धी होता जोसेफ पुलित्झर. या दोघा ंच्या स्पर्धेतून जी सवंग पत्रकारिता निर्माण झाली, तिच्यामुळे "यलो जर्नलीझम' (पीत पत्रकारिता) ही संज्ञा जन्माला आली.

पुलित्झरची चित्तरकथा

जोसेफ पुलित्झर हा मूळचा हंगेरियन. १८६४ मध्ये तो अमेरिकेत आला. १८७२ मध्ये त्याने पहिल्यांदा "वेस्टलिशे पोस्ट' हे वृत्तपत्र आणि त्यानंतर १८७९ मध्ये "सेंट लुईस डिस्पॅच' हे वृत्तपत्र विकत घेतले. या दोन्ही वर्तमानपत्रांचे विलीनीकरण करून त्याने " सेंट लुईस डिस्पॅच-पोस्ट' नावाचे वर्तमानपत्र काढले. १८८२ मध्ये त्याने "न्यू यॉर्क वर्ल्ड' नावाचे वर्तमानपत्र विकत घेतले. नुकसानीत जाणारे हे वर्तमानपत्र पुलित्झरच्या स्पर्शाने पुन्हा जोमाने व्यवसाय करू लागले. १८९५ मध्ये हर्स्ट याने न्यू यॉर्क सन नावाचे वर्तमानपत्र विकत घेतले. त्यानंतर अमेरिका-स्पेन युद्धाच्या वार्तांकनादरम्यान भडक बातम्या देण्याची या दोघांमध्ये स्पर्धा लागली. त्याचा एक मासला वर आलाच आहे. १९११ मध्ये मृत्यूनंतर पत्रकारांना पुरस्कार देण्यासाठी पुलित्झर याने मृत्यूपत्रात तरतूद केली होती. १९१७ मध्ये पहिल्यांदा या पुरस्कारांचे वितरण झाले. आज या पुरस्कारांना मोठी प्रतिष्ठा आहे.

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कार्यशैलीतील फरक
"न्यू यॉर्क टाईम्स' हे आज जगभरातील नावाजलेले दैनिक आहे. वॉशिंग्टनधील सत्ताधाऱ्यांना धक्के देण्याचे काम हे वर्तमानपत्र अनेकदा करते. त्यादृष्टीने "वॉशिंग्टन पोस्ट'च्या बरोबरीने त्याचे नाव घेतले जाते. या वर्तमानपत्राच्या यशामागे त्याची कार्यशैली कारणीभूत आहे. यात वर्तमानपत्राशी संबंधित रूथ ऍडलर यांनी लिहिलेल्या "अ डे इन दि लाईफ ऑफ दि न्यू यॉर्क टाईम्स' (प्रकाशन वर्ष १९८१) या पुस्तकातून या कार्यशैलीची झलक मिळते.

सकाळी तीन वाजता "न्यू यॉर्क टाईम्स'ची शेवटची शहर आवृत्ती प्रकाशनाला जात असताना या पुस्तकाला सुरवात होते. वर्तमानपत्राचे सहायक वृत्त संपादक टॉम डॅफ्रन आपल्या सहकाऱ्यांना "गुड नाईट'चा निरोप पाठवितात. यावेळी वर्तमानपत्राच्या न्यू यॉर्क येथील कार्यालयात काम थांबत असते. त्याच वेळेस जगभरातील "टाईम्स'चे वार्ताहर त्यांच्या त्यांच्या जागी कशा पद्धतीने बातम्या मिळविण्यासाठी झगडत आहेत, याचे वर्णन येते. त्यांत व्हिएतनाममध्ये युद्धभूमीवर गेलेल्या पत्रकारांप्रमाणेच पाकिस्तानातील सत्तासंघर्षाची इत्थंभूत बातम्या काढण्यासाठी झुल्फिकार अली भूत्तोंना त्यांच्या शाही प्रासादात भेटणाऱ्या वार्ताहराचाही समावेश आहे.

त्यातीलच एक वार्ताहर आहे जिम फेलोन. जेरुसलेममध्ये तो वार्तांकन करत आहे. शालेय जीवनात एक साधारण मुलगा असलेला जिम "टाईम्स'मध्ये "कॉपी बॉय' म्हणून लागतो. उपसंपादकांनी दिलेल्या बातम्या "कंपोझिंग'साठी द्यायचे, हे त्याचे काम. मात्र या कामाऐवजी पत्रकारिता त्याला अधिक आवडते. त्यासाठी तो पत्रकारितेचा अभ्यासक्रमही पूर्ण करतो. वर्गात पहिला येतो. विशेष म्हणजे त्याच्या या यशाची दखल वरिष्ठ घेतात आणि त्याला वार्ताहर म्हणून दाखल करून घेतात. बढत्या मिळत मिळत तो इस्राएलमध्ये जातो. वार्तारांना परदेशात पाठविल्यानंतर काही काळाने ते तेथील वातावरणाशी एकरूप होतात. त्याचा त्यांच्या कामावरही परिणाम होतो. त्यामुळे अशा वार्ताहरांना ठराविक काळाने दुसरीकडे, देशात अथवा परदेशात पाठविण्याचे "टाईम्स'चे धोरण आहे.अशा अनेक बाबी हे पुस्तक वाचल्यानंतर समोर येतात. त्यात काळानुसार काही बदल झाले असले, तरी भारतीय आणि अमेरिकी वर्तमानपत्रांच्या कार्यशैलीतील फरक यामुळे ठळकपणे समोर येते.