Tuesday, September 25, 2018

Rahul Bravado Makes Good Show, But No Impact


Congress President Rahul Gandhi is unarguably in his prime as an opposition leader firing one after another salvo on Prime Minister Narendra Modi. he has got a good toy to play with in the form of Rafale deal. He and his coterie understand perfectly well that government cannot disclose all the facts pertaining to this deal due to the issues of national security. This allows him and his party to create confusion among the masses. However, unfortunately for him, people are not ready to buy his bravado as a serious act of a mature politician. With BJP coming with more counter attacks with every passing day, scion of the Gandhi family find himself in a precarious situation where he can neither lead the fight to its logical conclusion no can he leave it halfway.
In such a scenario, Rahul’s theatricks have only contributed to raising the entertainment quotient of the political discourse.


On Tuesday, Rahul Gandhi continued his tirade on Twitter and addressed Air Force officers, the families of martyred pilots as well as Hindustan Aeronautics Limited workers. He said that he understood the pain of jawans, and would work to bring to justice all those who dishonoured and stole from them.


"To every Air Force officer and Jawan who has served India. To the family of every martyred Indian fighter pilot. To every person who ever worked for HAL. We hear your pain. We understand how you feel. We will bring to justice all those who dishonoured and stole from you," he said on Twitter.


Unlike his past campaigns, Rahul has shown some consistency in attacking the government on the Rafale deal, it must be acknowledged. However, he has already committed blunder by making his party organ, the recently rejected National Herald, to compare the scandal with the Bofors.


On Monday, he said the country's "chowkidar" Modi snatched money away from the poor and handed it over to industrialist Anil Ambani. "The chowkidar of the country has taken out Rs 20,000 crore from the pockets of the poor, martyrs and the jawans and put it in the pocket of (Anil) Ambani," Gandhi said at a meeting in the Jais area of his Lok Sabha constituency Amethi. This was one of the oldest statements made by Rahul ever since the Congress Party was relegated 44 seats in Lok Sabha and was forced to sit in the opposition.



However, the Congress’s past is going to haunt the party and Rahul for many days to come. if anything, Sambit patra's counter attack proved this one thing.


BJP on Tuesday alleged that Congress was pointing fingers over the current Rafale Aircraft deal as it could not receive the kickbacks during the UPA regime and therefore the deal did not materialise. Briefing reporters in New Delhi today, BJP spokesperson Sambit Patra reiterated allegations that there was a close link between UPA chairperson's son-in-law Robert Vadra and controversial arms dealer Sanjay Bhandari whose company has been red flagged by the NDA government. He claimed that during 2016 raids conducted at Bhandari's places, several sensitive documents including papers related to Rafale deal were found.


Several TV channels have picked up pieces of this story and exposed supposed link between Rahul, Congress and Sanjay Bhandari. These charges are going to stick with the Congress party that has become synonymous with scams, scandals, inefficiency and nepotism. There is a large number of critics who see Rahul Gandhi as a very reluctant and inefficient leader who is yet to come to terms with his responsibilities. It is only recently that he has shown some seriousness towards his job and detractors have pointed out role of individuals like Jyotiraditya Scindia and Divya Spandana behind his makeover.





"After Modi government came to power, we started action against Sanjay Bhandari and his company. Starting as Rs 1 lakh worth company, Offset India Solutions slowly turned big with Robert Vadra's help. There were raids in 18 places across India in 2016 and important papers including on Rafale were recovered," Patra said.


The documents also included 'confidential documents of Ministry of Defence'. "The papers also included proposals to buy mid-air refuellers and defence acquisition council papers. There were minutes of deliberations of the Contract Negotiations Committee".


Moreover, Pakistan has also shown some interest in this episode and has overtly backed Rahul. With Pakistan being a perpetual adversary of India, no right thinking person in the country will like that one of its political leader is like by Pakistan. Thus, ironically, people tend to support PM Modi rather than dislike him the way did it Rahul's father Rajiv Gandhi.


Therefore, the fact remains that Rahul’s bravado makes a good show and provides good copy to the paper, good footage to the channel and a lot of kilobytes for the digital media. But on ground, it does not make any impact at all.

Friday, August 10, 2018

यह कैसा है एका, जहां हर कोई अकेला


मुट्ठियां भींचते हुए और भौहें तनते हुए कांग्रेस तथा उसकी मिली जुली पार्टियों ने जिस विरोधी एकता की ललकार की थी, वह एक झटके में तार तार हो गई। और यह सब 3 महीने के भीतर! तथाकथित महागठबंधन का वजूद बनने से पहले ही बिखर गया! राज्यसभा में बहुमत होने के बावजूद विपक्षी दल उप सभापति पद के लिए अपने उम्मीदवार को जीता नहीं सके और वहीं यह भाजपा नीत एनडीए ने अपने झंडे गाड़ दिए। इससे विपक्षी एकता का जो शगूफा कुछ लोगों ने थोड़ा है वह खोखला है, इसका नजारा भी लोगों को हो गया।


इस चुनाव में संयुक्त जनता दल के हरिवंश नारायण सिंह को 125 और बी. के. हरिप्रसाद को 105 मत मिले। लोकसभा चुनाव में एक वर्ष से भी कम समय रहने के चलते यह चुनाव राजग और संप्रग दोनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण था।


भाजपा ने राजनीतिक सूझबूझ दिखाते हुए अपने सहयोगी हरिवंश को राज्यसभा उप सभापति पद के लिए मनोनीत किया। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के हरिप्रसाद को बड़े अंतर से हराया। हरिप्रसाद की राजनीतिक साख का अंदाजा इस बात से किया जा सकता है, कि पिछले 40 वर्षों के अपने राजनीतिक कैरियर में उन्होंने आज तक कोई चुनाव नहीं जीता है। कांग्रेस ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाकर अपनी फजीहत खुद की है। वैसे भी, राहुल गांधी के उदय के बाद पार्टी इसकी आदी हो चुकी है। खैर, अपना स्वतंत्र उम्मीदवार खड़ा करना देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए राजनीतिक चाल के रूप में समर्थनीय माना जा सकता है। लेकिन उस उम्मीदवार के लिए अन्य दलों से समर्थन मांगना किसके शान के खिलाफ था?


इस चुनाव में ऐसा भी मज़ेदार नजारा देखने को मिला कि कांग्रेस को नेस्तनाबूत करते हुए दिल्ली की सत्ता हथियानेवाली आम आदमी पार्टी उसको समर्थन देने के लिए मचल रही थी और कांग्रेस उससे किनारा करने की जद्दोजहद कर रही थी। इसी तरह सरकार का विरोध करनेवाली किसी भी पार्टी से तालमेल बिठाना कांग्रेसियों ने जरूरी नहीं समझा। महबूबा मुफ्ती की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी भी भाजपा को परास्त करने के लिए लालायित थी। लेकिन उसका समर्थन पाने के लिए भी कांग्रेस की ओर से कोई कोशिश नहीं की गई।





भाजपा की रणनीति


इसकी तुलना में, एनडीए नेतृत्व ने लगातार क्षेत्रीय दलों से संपर्क बनाए रखा। बीजू जनता दल जैसे जो क्षेत्रीय दल, जो एनडीए में नहीं है लेकिन जो घोर कांग्रेस विरोधी है, उन्हें पटाने में एनडीए नेताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी। विजयी और पराजित उम्मीदवार के मतों में केवल बीस का अंतर देखते हुए बीजेडी के 9 मत कितने अहम होंगे, इसका अंदाजा किया जा सकता है।


इसका नतीजा जो होनेवाला था वह हुआ। जेडीयू के उम्मीदवार ने भारी विजय प्राप्त की और अब इसके लिए कांग्रेस किसी और को दोष नहीं दे सकती।


भाजपा ने अपना उम्मीदवार खड़ा ना करते हुए एक तीर से दो निशाने लगाए। एक तरफ तो जेडीयू के खफा होने की खबरों को उसने पूर्ण विराम दिया, वहीं गैर भाजपा दलों को सिंह के खाते में वोट डालने के लिए प्रेरित भी किया। अब तेलंगाना राष्ट्र समिति को देखिए। तेलंगाना के इस सत्ताधारी दल ने कुछ ही महीने पहले तीसरे मोर्चे का आगाज किया था। टीआरएस के नेता चंद्रशेखर राव भाजपा विरोधी महागठबंधन की धुरी बनकर उभरे थे। लेकिन उसी टीआरएस ने अपना मत जेडीयू के पाले में डाल दिया। आंध्र प्रदेश के वाईएसआर कांग्रेस ने ना भाजपा को वोट दिया ना कांग्रेस को, बल्कि अनुपस्थित रहकर एनडीए की मदद की। हां, तेलुगू देशम पार्टी ने जरूर कांग्रेस को समर्थन दिया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कांग्रेस और टीडीपी में 2019 में गठबंधन होगा। कारण यह, की आंध्र में टीडीपी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस है और आंध्र में कांग्रेस का संघटनात्मक आधार बहुत ही कम है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश के अव्यवस्थित विभाजन को लेकर वहां के लोग कांग्रेस और यूपीए से अभी भी नाराज है। इसलिए उसके साथ रहना कोई नहीं चाहेगा। तमिलनाडु की सत्ताधारी अन्नाद्रमुक ने भी सरकार के साथ रहना पसंद किया। तमिलनाडु के वर्तमान नेतृत्वहीन परिदृश्य में वहां की पार्टी मोदी जैसे सशक्त नेता से दूरी कभी नहीं बनाएगी।


अकाली दल और शिवसेना जैसे नाराज चलनेवाले दलों से दिलमिलाई करने के लिए भी भाजपा ने इस मौके का फायदा उठाया। यानि वर्तमान दोस्तों को कायम रखते हुए वह नए दोस्तों की खरीदारी करती रही।


कुल मिलाकर कांग्रेस के पास तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा, डीएमके, पीडीपी और वामपंथियों के वोट रहे। क्या यह सारे दल अगले चुनाव में कांग्रेस के साथ खड़े रहेंगे? क्या राहुल गांधी का नेतृत्व उन्हें रास आएगा? इस चुनाव ने दिखा दिया, कि अधिकांश क्षेत्रीय दल अवसरवादी है और जिस दिल के पास सत्ता स्थापना के अवसर अधिक है उसके साथ जाने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। जिस तीसरे मोर्चे की डिंगे यह दल हांक रहे थे, और कांग्रेस उनके सुर में सुर मिला रही थी, वह बस दूर की कौड़ी है।


यहां कोई एका नहीं है बल्कि यहां हर कोई अकेला है।

Tuesday, August 7, 2018

करुणानिधी - अपरिपूर्णतांना पूर्णविराम


तमिळनाडूच्या अन्य दोन प्रसिद्ध मुख्यमंत्र्यांप्रमाणे प्रत्यक्ष पडद्यावर आलेले नसले, तरी करुणानिधी हेही चित्रपट कलावंतच म्हणूनच पुढे आले. कलैञर (कला मर्मज्ञ) या नावाने परिचित असलेल्या करुणानिधींकडे काव्यप्रतिभा आणि तमिळ भाषेवरील हुकुमत ही दोन अमोघ अस्त्रे होत. अनेक चित्रपटांच्या पटकथा लिहिण्यासाठी त्यांनी या अस्त्रांचा वापर केला.


करुणानिधी यांनी तमिळ चित्रोद्योगात पटकथा लेखक म्हणून पाय ठेवला. त्यावेळी त्यांचे वय विशीच्या आसपास होते. राजकुमारी या चित्रपटाच्या पटकथेला त्यांच्या लेखणीचा स्पर्श लाभला होता. याच चित्रपटाचा नायक मरुथुर रामचंद्रन या नावाचा एक नट होता. त्यापूर्वी काही चित्रपटांतून छोट्या-मोठ्या भूमिका केलेल्या या नटाचा नायक म्हणून हा पहिलाच चित्रपट होता. या चित्रपटाने गल्लाबारीवर कल्ला केला आणि या जोडीने मागे वळून पाहिलेच नाही - कोणाकडेच नाही!


द्राविड आंदोलन आणि नास्तिक विचारांच्या प्रसारासाठी ऐतिहासिक आणि सामाजिक कथा लिहिण्याबद्दल करुणानिधी प्रसिद्ध होते. यातील 'पराशक्ति' हा चित्रपट विशेष महत्त्वाचा. यातील काही दृश्यांमुळे हिंदूंनी त्याला विरोध केला होता आणि काही काळ या चित्रपटावर बंदीही आणण्यात आली होती. सन 1952 साली हा चित्रपट प्रदर्शित झाला. योगायोग असा, की या चित्रपटाद्वारे तमिळ चित्रसृष्टीतील आणखी एका भावी दिग्गजाने प्रवेश केला होता. तो दिग्गज होता शिवाजी गणेशन. अशा प्रकारे मक्कळ तिलगम (जनतेचा नायक) एमजीआर आणि नडिगर तिलगम (नटश्रेष्ठ) शिवाजी गणेशन या दोघांच्याही चित्रसृष्टीतील यशाची पायाभरणी कलैञरची होती!


परंतु चित्रपट ही करुणानिधींची ओळख नव्हे. चित्रपटांत येण्यापूर्वी कित्येक वर्षे करुणानिधी हे राजकीय आंदोलनांत सक्रिय होते. वयाच्या 14 वर्षीच (1938) त्यांनी हिंदी विरोधी आंदोलनात भाग घेतला होता. त्यानंतर एक वृत्तपत्र आणि 'मनवर मण्ड्रम' नावाची युवकांची संघटना काढली होती. द्राविड चळवळीची ही पहिली विद्यार्थी संघटना होती. त्यांची लेखणीवरील हुकूमत पाहून द्रविडर कळगम पक्षाने त्यांना चित्रसृष्टीत आणले आणि त्यांनी यशाच्या नव्या कथा रचल्या.


सी. एन. अण्णादुरै यांनी मोठ्या दूरदृष्टीने आपल्या पक्षाचा प्रसार करण्यासाठी चित्रपटांचे माध्यम वापरायचे ठरविले. त्यासाठी करुणानिधी, शिवाजी गणेशन आणि एमजीआर यांच्यासारख्या कसलेल्या कलावंतांचा वापर करण्यात आला. ही सगळी मंडळी आधी राजकारणात, म्हणजेच द्राविड चळवळीत, सक्रिय होती. त्यानंतर ती चित्रपटांत आली, कशासाठी? तर पक्षाच्या प्रसारासाठी. आपल्याकडे दादा कोंडके यांनी अनेक वर्षे शिवसेनेचे विचार जनसामान्यांपर्यंत पोचविण्याचे काम केले, किंवा निळू फुले यांच्यासारख्यांनी सेवादलात काम केले, त्याच जातकुळीचे काम होते हे.


प्रखर तमिळनिष्ठा आणि ज्वलंत हिंदीविरोध ही त्यांच्या कारकीर्दीची वैशिष्ट्ये. त्यांचे मूळ नाव दक्षिणामूर्ती. हिंदी विरोधी आंदोलनाच्या काळात त्यांनी ते बदलून मुथ्थुवेल असे करून घेतले. इतकेच नव्हे तर घरातील सर्व सदस्यांचे नाव संस्कृतला समानार्थी नावांचे ठेवले. उदा. कनिमोळी (मधुरवाणी), मारन (मदन), अळगिरी (सुंदर) इ. सन १९५३ मध्ये द्रामुकने पहिले मोठे आंदोलन हाती घेतले दालमियापुरम (तिरुचिरापल्ली जिल्हा) या गावाचे नाव बदलण्यासाठी. या नावामुळे रामकृष्ण दालमिया या उत्तर भारतीय व्यक्तीकडून दाक्षिणात्यांच्या शोषणाचे उदात्तीकरण होत असल्याचा आरोप करून द्रामुकने नामांतराचा आग्रह धरला. मु. करुणानिधी या २९ वर्षीय तरुणाच्या नेतृत्वाखाली कार्यकर्त्यांनी दालमियापुरम रेल्वे स्थानकावरील हिंदी नाव पुसून टाकले आणि गावाचे नाव कल्लकुडि केले.



जवळपास 75 पटकथा लिहिल्यानंतर मिळालेल्या लोकप्रियतेच्या आधारे 1957 साली करुणानिधींनी तमिळनाडू विधानसभेत प्रवेश केला आणि वर म्हटल्याप्रमाणे एमजीआरच्या साहाय्याने पक्षाचा प्रचारही केला. सन १९६७ साली अण्णादुरै मुख्यमंत्री झाल्यानंतर केवळ दोन वर्षांत त्यांचा मृत्यू झाला. त्यांनीच आपला वारसदार नेमलेल्या एम. करुणानिधी यांनी मुख्यमंत्रीपदाची शपथ घेतली. करुणानिधींनी सुरुवातीपासूनच पक्षात स्वतःचे एक स्थान निर्माण केले होते. त्यांच्या चातुर्याचा निदर्शक म्हणून एक किस्सा सांगितला जातो. १९५० च्या दशकात एका पोटनिवडणुकीत विजय मिळाल्यानंतर अण्णादुरै यांनी द्रामुकच्या कार्यकर्त्यांची बैठक घेऊन त्यांचे कौतुक केले. त्यावेळी तरुण करुणानिधींना बोलावून त्यांनी खास एक अंगठी देऊन त्यांचा सत्कार केला. पोटनिवडणुकीत अंगमेहनत घेतलेल्या कार्यकर्त्यांना साहजिकच ही बाब खटकली. त्यांनी अण्णादुरैंकडे ही तक्रार मांडली. त्यावर अण्णादुरैंनी त्या कार्यकर्त्यांना सांगितले, की ती अंगठी मुळात करुणानिधींनीच दिलेली होती. कार्यक्रमात ती अण्णादुरैंनी ती सर्वांसमक्ष द्यावी, यासाठी करुणानिधींनी ती आदल्या दिवशी अण्णांना दिली होती. "तुम्हीही पैसे द्या, तुम्हालाही दागिने देऊ," असं अण्णांनी या कार्यक्रमात सुनावले. सन 1969 साली ते मुख्यमंत्री झाले आणि त्यांनी द्रामुक पक्षावर नियंत्रण मिळविले. त्यानंतर चार वेळेस ते मुख्यमंत्री बनले.


अशा पद्धतीने पक्षात स्वतःचे स्थान वाढविल्यामुळे करुणानिधींकडे साहजिकच अण्णांच्या मृत्यूनंतर पक्ष व सत्तेची धुरा आली. त्यानंतर दोन वर्षांनी बांगलादेश युद्धातील विजयाच्या पार्श्वभूमीवर इंदिरा गांधी यांनी मुदतपूर्व निवडणुकांची घोषणा केली. चाणाक्ष करुणानिधींनी ही संधी साधली आणि काँग्रेसशी घरोबा केला. त्या निवडणुकीत काँग्रेस आणि द्रामुक दोघांच्याही पदरात चांगल्या जागा आल्या. त्यातून दोन गोष्टी साध्य झाल्या. पक्षाला यश मिळवून देणारा नेते म्हणून करुणानिधींनी स्वतःची हुकूमत द्रामुकवर स्थापन केली. शिवाय लोकसभेसाठी राष्ट्रीय पक्षांना आणि विधानसभेसाठी स्थानिक पक्षांना झुकते माप देण्याच्या सूत्रावर युती करण्याचा मार्ग रूढ झाला. तुम्ही राज्यात लक्ष घालायचे नाही आणि आम्ही केंद्रात लुडबुड करणार नाही, असा द्राविडी पक्षांनी जणू करारच केला. काँग्रेस आणि भाजपसारख्या देशव्यापी पक्षांनी द्रामुक व अण्णाद्रामुक या पक्षांशी सोयीनुसार केलेल्या सोयरिकीची ही पूर्वपीठीका होय.


इंदिरा गांधींच्या सहकार्यामुळे उत्साहित झालेल्या आणि द्रामुकवर मांड बसलेल्या करुणानिधींनी एम. के. मुथ्थु या मुलाला वारसदार म्हणून पुढे आणण्याचे प्रयत्न सुरू केले. पक्षासाठी मेहनत घेणाऱ्या नेत्यांना हे खुपले नसते तर नवलच. एमजीआर यांनी या असंतोषाला वाचा फोडण्यास सुरवात केली. १९७२ साली पक्षाच्या अधिवेशनात एमजीआर यांनी खर्चाचा हिशोब मागितला. त्याची साहजिकच प्रतिक्रिया आली आणि एमजीआर यांची द्रामुकमधून हकालपट्टी झाली. अन् सख्खे मित्र पक्के वैरी झाले. वैराचा तो वारसा जयललितांनी पुढे नेला. अन् जयललितांच्या पश्चात् करुणानिधींना दफनासाठी हवी ती जागा न देऊन त्यांचे अनुयायीही तो वारसा पुढे नेत आहेत. अर्थात करुणानिधी व त्यांच्या अनुयायांनी जे पेरले तेच आज त्यांना मिळत आहे.



विवेकवादी आणि नास्तिकवादी म्हणून करुणानिधींना काही जण डोक्यावर घेऊन नाचत असले तरी ते काही खरे नव्हे. त्यांचा नास्तिकवाद हा हिंदूंच्या प्रथा-परंपरांचा उपमर्द करण्यापुरत्याच मर्यादित होत्या. एरवी हिरव्या रंगाची शाल शुभ मानणे, ज्योतिषाला विचारून कामे करणे इत्यादी अनेक प्रकार ते करत असत. ते रुग्णालयात उपचार घेत असताना त्यांच्या प्रकृतीसाठी प्रार्थना करावी की नाही, यावरून त्यांच्या पक्षातील आस्तिक व नास्तिक कार्यकर्त्यांमध्ये जुंपली होती.


अशा रीतीने जीवनभर ज्या तत्त्वांचा प्रचार-प्रसार त्यांनी केला, ती सर्व मुरडून टाकण्याची वेळ त्यांच्या आयुष्याच्या शेवटी आली होती. आज तमिळनाडूत हिंदी ही अस्पृश्य भाषा उरलेली नाही. राजकीय कारणांमुळे दूरदर्शनवर हिंदी बातम्या दिसत नसल्या तरी हिंदी चित्रपट व वृत्तवाहिन्या सर्रास दिसतात. चेन्नईमधून राजस्तान पत्रिका या हिंदी वृत्तपत्राची आवृत्ती निघते. मंदिरांमध्ये व अन्य प्रार्थनास्थळांमध्ये भक्तांची संख्या वाढली आहे. भाजपसारख्या पक्षाशी युती करून त्यांचे उरले-सुरले धर्मनिरपेक्ष सोवळेही मिटले होते. जयललितांचा पराभव करून मुख्यमंत्री म्हणून निधन व्हावे, ही त्यांची इच्छा होती. तीही अपूर्ण राहिली, म्हणजेच सगळेच अपुरे राहिले.


अशा प्रकारे त्यांच्या निधनाने विविध प्रकारच्या अपरिपूर्णतांना एक पूर्णविराम मिळाला आहे...!

Thursday, August 2, 2018

When Political Motives Turn Shameless....


The anxiety and political motives of West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee are turning into shamelessness with every passing day. Her brazenness has reached such a state that she is openly threatening the government and the nation of a possible civil war. The lady who was once hailed as a fiery leader has metamorphosed into a militant leader.


Banerjee on Tuesday alleged that the National Registrar of Citizens (NRC) exercise in Assam was done with a "political motive" to divide people and warned that “it would lead to bloodbath and a civil war in the country.”


As has become her habit for quite a time, she attacked the central government and BJP also saying that the saffron party was trying to divide the country and asserted this will not be tolerated.
"The NRC is being done with a political motive. We will not let this happen. They (BJP) are trying to divide the people. The situation cannot be tolerated. There will be a civil war, blood bath in the country," Banerjee told a conclave.



SC-Driven Exercise


The massive Supreme Court-monitored exercise to identify genuine Indian nationals living in Assam excluded over 4 million people from the final draft list. The issue rocked both house of Parliament after which Home Minister Rajnath Singh appealed to the opposition not to politicize the sensitive matter as the list has been published on the directives of the SC and the Centre had "no role" in it.


He asserted that no "coercive" action would be taken against those whose names were excluded from the NRC draft list.


The truth of the matter is that TMC, like Congress and left parties, has nurtured a culture of illegal immigrants and infiltrators. These parties owe their existence and success to this dubious voter base. They can hardly afford to alienate them. That is why Banerjee and her ilk make a hue and cry over the issue. Joining them with chorus is Congress Party. Yes, that same old party which has lately habituated itself to play second fiddle to strong regional forces.


It is a hard-established fact that India is suffering from illegal immigrants for decades. The problem dates as back as Nation's independence. Even past prime ministers like Indira Gandhi and Rajiv Gandhi have appreciated this fact and vowed to eradicate this menace. Security experts have pointed out a number of times the risks involved in allowing infiltrators a free access to the country. Besides eating up a sizable chunk of resources, these infiltrators have caused huge population explosion. Rather, this inhibited infiltration is said to be one of the main reason of India's population after 1980s and 90s. This was also the time when the successive central governments were weak and the country witnessed a number of terrorist attacks.


It is true that the first waves of illegal immigrants came to India owing to their poverty in search of livelihood and security, due to extreme poverty and unemployment. . It is also true that the first settlers were, if we may say so, consisted of Muslim as well as Rhodium Libreus. However, once it was seen that India is a very open country that welcomed immigrants from every side, the trickle soon turn into a stream. And soon, the camel enjoyed hospitality of the tent while his owner had to live in the open ground.


With central governments showing little interest to find a solution to the infiltration problem and state governments willing partner in the crime, it ultimately became one of the biggest security concerns for India. Many of the illegal immigrants were found involved in nefarious activities like human trafficking, counterfeit currency and drug trade. Gradually, the professed secular parties turned these groups into captive vote banks. They not only harbored these groups but also actively encouraged them to flourish. It is no secret that these secular parties encouraged illegal migration and encouraged them to get citizenship of India. Many leaders of these parties procured jobs, even government jobs, to them. This was the classic modus operandi in Kashmir, Assam and West Bengal.



Disappearing Vote Banks


It is this vote bank that Mamata Banerjee is seeing being eroded with a single stroke of national register of citizenship (NRC). All the noise that she is making is because of this. Mamata is terrified even with the thought of deporting illegal migrants as they form the core of her 'constituency'. She became hysterical the moment Assam government announced the NRC list in which 4 million people were identified as aliens. Even assuming that this list will be modified and a half of them are retained, yet Congress, TMC and Left will lose 2 million voters.


This is why they are spewing venom on government accusing the latter of dividing the country. This same gang opposed deporting Rohingya Muslims even after conclusively proving that they had terrorist affiliations.


Notwithstanding these theatrics, the citizens of this country vehemently support the move regardless of the fact that it was carried out on Supreme Court’s order and not by the government itself. This long pending and much needed development will have serious repercussions. Most importantly, it has bared open the groups that think in national interest and those otherwise.

Tuesday, July 31, 2018

‘एनआरसी’वर तडफड? नव्हे, 2019ची बेगमी!


लोकसभेची निवडणूक जसजशी जवळ येईल, तसतसे ‘लोकशाहीवादी’ पक्षांचे अनेक रंग उडून मूळ स्वरूप उघडे पडत जाणार आहे. प्रत्येक मुद्द्याला राजकीय रंग देऊन स्वतःलाच चिखलात अडकविण्याचे प्रयत्न हे पक्ष करणार आहेत. नॅशनल रजिस्टर ऑफ सिटीझन्सच्या मुद्द्यावर हे पक्ष करत असलेला थयथयाट हा त्या भविष्याची एक चुणूक आहे.


आसामच्या नागरिकांची गणती करण्यासाठी तयार केलेल्या नॅशनल रजिस्टर ऑफ सिटीझन्स (एनआरसी) याच्या मसुद्याचा दुसरा भाग बाहेर पडला आणि लिबरल डोंबाऱ्यांनी आपला जुनाच खेळ सुरू केला. या रजिस्टरमध्ये आसामच्या रहिवाशांची नावे आहेत आणि हे रजिस्टर काही कालावधीनंतर अपडेट करण्यात येते. याचाच अर्थ त्यात सुधारणा करता येऊ शकते.


आताच्या ताज्या रजिस्टरचे काम 2014 मध्ये सुरू झाले आणि ते 2016 पर्यंत सुरू होते. या दरम्यान एकूण 3.29 कोटी लोकांनी नागरिकत्वासाठी अर्ज केला होता. आपण आसामचे रहिवासी आहोत असा त्यांचा दावा होता. या वर्षीच्या जानेवारीत या रजिस्टरचा पहिला मसुदा बाहेर पडला होता. त्यात 1.90 कोटी लोकांना आसामचे रहिवासी म्हणून मान्यता मिळाली होती. त्याही वेळी मोठा गदारोळ उठला होता. मात्र अजून अंतीम यादी बाहेर यायची असून पूर्ण छाननी झाल्यानंतर यादी बाहेर येईल, असे सरकारने तेव्हा सांगितले होते. सोमवारी या रजिस्टरचा दुसरा भाग बाहेर पडला. त्यातील माहितीनुसार 40 लाख लोकांचे नागरिकत्व हरविण्याची शक्यता निर्माण झाली आहे.


अन् याच कारणावरून विरोधी शिबिरांमध्ये खळखळ सुरू झाली आहे. ज्या चाळीस लाख लोकांची नावे या यादीतून गळाली आहेत, त्यांनी यासंदर्भात आवाज काढणे समजू शकता येईल. परंतु चहापेक्षा किटली गरम या म्हणीला अनुसरून या संशयास्पद नागरिकांऐवजी विरोधी पक्षांनाच जास्त कंठ फुटला आहे. नेहमीप्रमाणे या आक्रस्ताळलीलेचे नेतृत्व पश्चिम बंगालचे मुख्यमंत्री ममता बॅनर्जी करत आहेत. त्या तर पहिली यादी बाहेर पडली तेव्हापासून अस्वस्थ आहेत. त्यांच्या पक्षाने या विषयावर लोकसभेत स्थगन प्रस्तावाचीही नोटीसही दिली होती. लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन यांनी ती स्वीकारला नाही हा भाग अलाहिदा. त्या नकारावरील ममतांचा जळफळाट शमत नाही तोच आता हा दुसरा आघात झाला आहे. आपले हक्काचे चाळीस लाख मतदार एका फटक्यात हरविण्याच्या भीतीने त्यांच्या तोंडचे पाणी पळाले आहे. एखाद्या व्यक्तीने निगुतीने आपले डबोले एखाद्या झाडाखाली पुरून ठेवावे आणि महापुरात त्या झाडासकट डबोलेही वाहून जावे, अशी त्यांची गत झाली आहे.


वास्तविक हा प्रश्न आसामचा. आसाम आणि बंगाल हे शेजारी राज्य आहेत. आसाममध्ये मोठ्या संख्येने बंगाली लोक राहतात आणि उलट बंगालमध्ये मोठ्या संख्येने सामील लोक राहतात, ही गोष्ट खरी आहे. पण त्यामुळे आसामच्या विषयांमध्ये नाक खुपसण्याचे ममताना काही कारण नाही. परंतु या विषयावर बंगाली कार्ड खेळण्याची चाल ममतांनी खेळली आहे. एनआरसीच्या विषयात केंद्र सरकारने ममतांना विश्वासात घेतले नाही, असे त्यांच्या पक्षाचे खासदार डेरेक ओब्रायन म्हणाले. आता हा एनआरसीचा विषय सर्वोच्च न्यायालयाच्या आदेशावरून सुरू झालेला, त्याची व्याप्ती आसाममधली आणि त्यासाठीची सर्व रसद केंद्र सरकारने दिलेली. यात ममता बॅनर्जी यांची भूमिका कुठून येते, हे त्यांचे त्यांनाच माहीत.


“भाजप सरकारने ज्या चाळीस लाख रहिवाशांची नावे वगळली आहेत त्यातील बहुतांश बंगाली आणि बिहारी आहेत. त्यामुळे हे नागरिक स्वतःच्याच देशात निराश्रित बनले आहेत,” असा कांगावा ममतांनी केला आहे. तसेच आपली नेहमीची तबकडी वाजवत, हिंदू आणि मुस्लिमांमध्ये भेदभाव होत असल्याचाही राग आळवला आहे. बंगालमध्ये कॉंग्रेस, डावे पक्ष आणि तृणमूल या सर्वांची रोजीरोटी बांगलादेशी घुसखोरांच्या जीवावर चालू आहे. त्यामुळे त्यांनीही ममतांच्या सुरात सूर मिसळला.



अर्थात आता आलेली यादीही शेवटची नाही. अंतिम यादी डिसेंबर महिन्यात येणार आहे. परंतु 2018 च्या क्षितिजावर 2019 च्या निवडणुका दिसत असताना तेवढा धीर धरण्याची बुद्धी विरोधकांना कशी होईल? ‘मुस्लिम विरोधी भाजप’ या ठरलेल्या संकल्पनेनुसार तोंड वाजविण्यासाठी विरोधकांना सुंदर कोलीत मिळाले आहे. या रजिस्टरचे काम सर्वोच्च न्यायालयाच्या आदेशानुसार सुरू झाले, त्यावर देखरेख सर्वोच्च न्यायालयाची होती अशा तपशीलांकडे एकतर सेक्युलर टोळ्यांना लक्ष द्यायचे नाही किंवा दिसले तरी त्यांना ते पाहायचे नाही.


देशात आसाम हे एकमेव असे राज्य आहे जेथे राज्याच्या मूळ रहिवाशांची माहिती एकत्र ठेवण्यासाठी राष्ट्रीय नोंदणी दस्तावेज आहे. याचे कारण म्हणजे इंग्रजांच्या काळापासून आसाममध्ये मोठ्या प्रमाणावर घुसखोरी चालू आहे. आसाममध्ये चहाचे मळे सुरू केले ते इंग्रजांनी. या मळ्यांमध्ये काम करण्यासाठी बाहेरून मोठ्या प्रमाणावर मजूर आणण्यात आले. हे मजूर नंतर आसाममध्ये स्थायिक झाले. त्यामुळे स्थानिक कोण आणि उपरा कोण हे कळणेही अशक्य झाले. त्यानंतर देशाची फाळणी झाल्यानंतर निर्वासितांचे लोंढे आसाममध्ये येऊ लागले. या बाहेरच्या लोकांना स्थानिकांकडून विरोध सुरू झाला. तेव्हा सरकारने आसामचे निवासी निश्चित करण्यासाठी रजिस्टर तयार करण्याचा निर्णय घेतला. अशा प्रकारचे नॅशनल रजिस्टर ऑफ सिटीझन्स 1951 मध्ये तयार करण्यात आले. त्यात आसामच्या प्रत्येक गावातील घर, संपत्ती आणि लोकांचे तपशील होते.


बांगलादेश निर्मिती आंदोलनाच्या काळात असंख्य घुसखोर आसाममध्ये शिरू लागले. त्यांच्या विरोधात 1970 आणि 1980च्या दशकात मोठे आंदोलन उभे राहिले. प्रफुल्लकुमार महंत हे त्या आंदोलनाचे एक प्रमुख नेते. आसाम गण परिषद या पक्षाची स्थापना या आंदोलनातून झाली. राजीव गांधी पंतप्रधान असताना त्यांनी या आंदोलकांशी जो करार केला त्यावेळी या रजिस्टरमध्ये सुधारणा करण्याची मागणीही त्यांनी मंजूर केली होती. त्यानुसार 24 मार्च 1971 च्या मध्यरात्री ज्यांची नावे मतदार यादीत होती त्यांना आसामचे रहिवासी म्हणून मान्यता मिळाली. त्यामुळे या तारखेनंतर आलेले सर्व लोक आपोआप घुसखोर ठरले.


नरेंद्र मोदी यांनी प्रचार काळात बांगलादेशी घुसखोरांचा मुद्दा उचलला असला तरी त्या पूर्वीपासून हा मुद्दा चर्चेत होता. त्यावर खटलेबाजी सुद्धा सुरू होती. सर्वोच्च न्यायालयाने डिसेंबर 2014 मध्ये यासंदर्भात आदेश देऊन 30 जून 2018 पर्यंत हे रजिस्टर अद्ययावत करण्यास सांगितले होते. त्याचीच अंमलबजावणी आता झाली आहे.


आता भलेही चाळीस लाख मतदार पूर्णपणे वगळण्यात येणार नाहीत. डिसेंबरमधील अंतिम यादी येईपर्यंत त्यातील अनेकांची नावे परत येतील. परंतु यातील 50 टक्के नावे गडप झाली तरी सेक्युलरांची वीस लाख मते गेल्यात जमा आहेत. हा त्यांचा जी तडफड चालू आहे त्याचे कारण हे आहे. घुसखोरांच्या मतांवर पोसलेल्या या पक्षाची जणू अस्तित्वासाठी लढाई चालू हे. भाजप या चारचौघांसारख्या सामान्य राजकीय पक्षाला एक हिंदुत्ववादी पक्ष करण्यात सेक्युलर पक्षांच्या अशा अतिरेकी कलकलाटाचा मोठा वाटा आहे. आताही त्या पक्षाच्या 2019 च्या मतांची बेगमीच या नाट्यातून घडणार आहे, आणखी काही नाही.

Friday, July 27, 2018

नैया को डगमगा न देने की चुनौती


अविश्वास प्रस्ताव से पहले विरोधी खेमे में उत्साह की ऐसी बयार थी, कि मानो नरेंद्र मोदी और भाजपा का सफाया बस एक कदम दूरी पर है। सभी विरोधी दलों ने ऐसा माहौल बनाया था, कि सरकार के नाकों चने चबाने का समय आ गया। अपनी एकजुटता का स्वांग बनाने से लेकर बेसिर-पैर के आरोपों की झड़ी लगाने तक हर दल ने एक भीषण संघर्ष के लिए नगाड़े बजाने शुरू किए थे। लेकिन शुक्रवार को लोकसभा में जब अविश्वास प्रस्ताव आया और सभी नेताओं के भाषणों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जवाब देने के लिए उठे, तो यह सारा स्वांग फुर्र हो गया।


इस प्रस्ताव का नतीजा क्या होनेवाला है यह तो हर कोई जानता था, लेकिन जिस तरह वह धड़ाम से औंधे मुंह गिरा उसने सरकारी खेमे में नई ऊर्जा भरने का काम किया। छब्बे गए चौबे बनने, दुबे बनके वापस आए की कहावत को चरितार्थ करते हुए विरोधियों ने मोदी में विश्वास की गर्जना की थी और उनमें आत्मविश्वास भरकर लौट गए। जहां एक ओर अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 126 मत पड़े वही सरकार के पक्ष में 325 मत पड़े, लगातार हुए उपचुनाव में जिस तरह से भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ा था, उससे भाजपा के तेवर कुछ नर्म हुए थे। लेकिन बहुमत के इस विशाल अंतर ने उसे कठोर मुद्रा अख्तियार करने का मौका दे दिया। भाजपा नीत रालोआ के पास जितने सदस्य कागज पर है उससे कहीं ज्यादा मत उसे प्राप्त हुए।


भाजपा बुलेट ट्रेन में सवार करते हुए आगे निकल गई जबकि विपक्ष पैसेंजर गाड़ी में सिग्नल की राह देखता रहा। यूं भी कह सकते है कि विपक्षी एकता का बुलबुला बनने से पहले ही फूट गया। सरकार द्वारा विश्वास प्रस्ताव जीतने के बाद शेयर बाजार ने जिस तरह से उछाल ली उसे यही संदेशा लोगों तक गया, कि सरकार अभी भी अपने ट्रैक पर है।


यह बात सच है कि संसद की जिरह और चुनाव का रण इन दोनों में अंतर होता है। लेकिन संसद में सरकार को घेरकर चुनाव में मोदी को मात देने का विपक्ष का सपना आखिर सपना ही रह सकता है। इस दो दिवसीय चर्चा पर एक नजर डालें तो यह बात साफ हो जाती है कि मोदी को धूल चटाने के लिए विपक्ष को एक बड़े चमत्कार की जरूरत है। इसके लिए विपक्ष के पास अभी लगभग एक साल का समय है। मगर सोनिया गांधी से लेकर शरद पवार तक और राहुल गांधी से लेकर चंद्रबाबू नायडू तक यह भूल नहीं सकते, कि जितना समय उनके पास है उतना ही समय नरेंद्र मोदी के भी पास है। अतः जो चमत्कार विपक्ष कराना चाहता है वही या उससे भी बड़ा चमत्कार नरेंद्र मोदी नामक जादूगर करवा सकता है।


लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा बिल्कुल कोरी रही। विपक्ष की तरफ से गंभीर हमला करने में कोई भी सफल नहीं रहा। राहुल गांधी ने जोरदार कोशिश की, उन्होंने लड़ाई की मुद्रा भी अच्छी तरह अख्तियार की। ऐसा लगने लगा था, कि शायद विपक्षी बेंच पर बिताए हुए चार वर्षों ने उन्हें राजनीति के गुर सीखा दिए है। भाषण के अंत में नरेंद्र मोदी को उनके द्वारा गले लगाना भले ही राजनीतिक पैंतरे के रूप में उल्लेखित हो, लेकिन उसके बाद जिस तरह की आंख मिचोली उन्होंने की और पकड़े गए उससे उनका नौसिखियापन फिर से उजागर हुआ। अपने समर्थकों को निराश करने में राहुल गांधी ने बड़ी ही महारत हासिल की है।


सन 2012 से लेकर भारतीय राजनीति के लगभग सभी प्रमुख खिलाड़ियों ने नरेंद्र मोदी की वाक्पटुता से समझौता कर लिया है। आज की तारीख में अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और जन सामान्य को संबोधित करने में जो विशेषज्ञता मोदी ने हासिल की है उसके आसपास भी कोई फटकता हुआ नहीं दिखता। उनके इसी कौशल का एक और नज़ारा लोकसभा में देखने को मिला।


विश्वास मत प्राप्त करनेवाले सरकार को विजय मिली और इस प्रस्ताव को लानेवालों को अपना कर्तव्य पूरा करने की संतुष्टि मिली। लेकिन सबसे ज्यादा फजीहत शिवसेना की हुई। शिवसेना की भूमिका क्या है यह आखिर तक कोई समझ नहीं पाया। भाजपा को समर्थन देने या उसका विरोध करने को लेकर पार्टी में असमंजस का माहौल रहा। नौबत यहां तक आई, की शिवसेना भाजपा को समर्थन दे रही है, उसका विरोध कर रही है या अनुपस्थित रहकर इज्जत बचा रही है इसकी सुध लेना भी लोगों ने छोड़ दिया। आगामी समय में इसका असर जरूर देखने को मिलने वाला है। बताया जाता है, कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने महाराष्ट्र में अकेले के दम पर लड़ने के लिए कार्यकर्ताओं को आदेश दिए हैं। “मजबूर ये हालात इधर भी है उधर भी,” यह पंक्ति अगर किसी पर आज फिट बैठती है तो वह भाजपा और शिवसेना है।



बीजू पटनायक के नेतृत्व वाले बीजू जनता दल (बीजेडी) ने राजनीतिक सूझबूझ दिखाते हुए अविश्वास प्रस्ताव से किनारा कर लिया। कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी बनाए रखने वाले बीजेडी ने अब तक खुद को कई तूफानों से अलग रखा है। और इस मैच में, जिसका नतीजा पहले एक्शन से ही तय था, किसी का भी पक्ष लेना पार्टी ने मुनासिब नहीं समझा जो उसकी समझदारी का परिचायक है।


राजनीति में एक और मजबूर पार्टी है तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी अन्नाद्रमुक। लोकसभा में तीसरे नंबर के सदस्य जिस पार्टी के पास है उसकी भूमिका यूं तो महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन अन्नाद्रमुक आज नेतृत्व की कसौटी से गुजर रही है। उसका वजूद केंद्र की मोदी सरकार के रहमों करम पर कायम है। इसलिए उसका भाजपा के साथ जाना न किसी को खटक सकता है न आश्चर्यचकित कर सकता है। यह भी सही है, की अन्नाद्रमुक की घोर विरोधी द्रमुक कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाए हुए हैं और इसलिए वह उस खेमे में नहीं जा सकती।
कुल मिलाकर भाजपा की नैया अनुकूल हवाओं के सहारे आगे बढ़ रही है। तृणमूल कांग्रेस, धर्मनिरपेक्ष जनता दल (जेडीएस) और तेलंगाना राष्ट्र समिति जैसी चंद प्रादेशिक पार्टियों को छोड़ दे तो उसके सामने कोई बड़ी चुनौती नहीं है। सपा और बसपा अभी अपने अस्तित्व को बचाए रखने के फिराक में है। जिस तेलुगू देशम पार्टी ने यह प्रस्ताव लाया था उसकी और उसके नेता चंद्रबाबू नायडू की विश्वसनीयता हमेशा संदेह के घेरे में रही है। कमोबेश वही हाल महाराष्ट्र में एनसीपी का है।
कांग्रेस पर तंज कसते हुए मोदी ने कहा था
“न मांझी न रहबर
न हक में हवाएं है,
कश्ती भी जर्जर
यह कैसा सफर है।”
मोदी के नेतृत्व में भाजपा की हालत बिल्कुल इसके विपरीत है। उसके सामने चुनौती है तो बस अपनी नैया को डगमगा न देने की।

Wednesday, May 30, 2018

हत्या झाली, बळी पडला दलित... आता दाखवा तुमचा कैवार!


दलितांवरील अत्याचार आणि मनुवादी इत्यादी टेप वाजविणाऱ्यांसाठी एक बातमी आली आहे. बातमी अशी खळबळजनक, की त्यांनी मूगच गिळून बसावे. ती आहे केरळची. रविवारी राज्यात चेंगन्नूर मतदारसंघात पोटनिवडणूक होती. अलीकडच्या प्रथेप्रमाणे ही पोटनिवडणूक म्हणजे सत्ताधारी डावी लोकशाही आघाडी (लेफ्ट डेमोक्रॅटिक फ्रंट -एलडीएफ) सरकारच्या दोन वर्षांच्या कामगिरीचे मूल्यमापन म्हणून मिरविण्यात होत होती. एकीकडे या निवडणुकीसाठी मतदान होत होते आणि दुसरीकडे 23 वर्षांच्या एका युवकाची हत्या होत होती. केव्हिन पी. जोसेफ असे या युवकाचे नाव होते. त्याचा अपराध इतकाच होता, की तो दलित होता आणि एका सुसंपन्न ख्रिस्ती कुटुंबातील मुलीवर त्याने प्रेम केले होते.


इतक्यात अळीमिळी करण्याची मानसिक तयारी झाली नसेल तर समस्त पुरोगाम्यांसाठी पुढचे तपशील पाहू. ज्या टोळीने केव्हिनचे अपहरण करून त्याचा खून केला त्या टोळीचे नेतृत्व नियाझ नावाची व्यक्ती करत होती. हा नियाझ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पक्षाची युवा आघाडी असलेल्या डेमोक्रॅटिक फेडरेशन ऑफ इंडियाचा (डीवायएफआय) सचिव आहे. खुद्द राज्याच्या पोलिसांनी या वास्तवाला दुजोरा दिला आहे. पोलिसांनी ईशान नावाच्या एका युवकाला ताब्यात घेतले आहे आणि तोही डीवायएफआयचा कार्यकर्ताच आहे.





केव्हिनचा मृतदेह सोमवारी सकाळी राज्याची राजधानी तिरुवनंतपुरम येथून जवळच असलेल्या थेनमाला येथे एका कालव्यात मिळाला. आधी त्याचे डोळे काढून नंतर मानेवर प्रहार करून त्याला मारल्याचा अनुमान पोलिसांनी व्यक्त केला आहे. शनिवारी रात्री मुलीचा भाऊ शानू चाको, डीवायएफआय नेता नियाझ व इतरांच्या नेतृत्वाखाली दहा जणांनी केव्हिनच्या घरावर हल्ला करून त्याचे अपहरण केले होते.


गेले काही महिने दलितांच्या कल्याणाचा मक्ता घेतल्यासारखे छाती काढून चालणारे डावे पक्ष या प्रकरणानंतर जरा ताळ्यावर आले आहेत. त्यांचा चार अंगुळे वर चालणारा रथ काहीसा जमिनीवर यायला आता हरकत नाही. "या मुलीचे कुटुंब कोणत्याही किंमतीवर तिला परत आणू पाहत होते आणि यासाठी स्थानिक डीवायएफआय नेत्यांनी व कार्यकर्त्यांनी त्यासाठी मदत केली. या हत्येमागे राजकीय पैलू आहेत आणि ते जात-आधारित राजकारणाचे आहे. केव्हिन हा अनुसूचित जातीचा मुलगा होता आणि केरळमध्ये वामपंथी पुरोगामी पक्षही अशा प्रकारच्या विवाहाच्या विरोधात आहेत, हे एक दुर्दैवी वास्तव आहे," असे दलित कार्यकर्त्या धन्या रामन यांनी ‘फर्स्टपोस्ट’ला सांगितले.





साम्यवाद्यांची सद्दी असलेल्या अन्य बहुतेक राज्यांप्रमाणे केरळचेही राजकारण रक्तपातावरच चालते. असे राजकारण करण्यासाठी पोलिसांचेही राजकीयकरण करणे आवश्यक असते. केरळमध्येही तेच घडले आहे. गेल्या काही महिन्यांमध्ये अशा प्रकारच्या अनेक घटना समोर आल्या आहेत. एका महिन्यापूर्वीच एर्नाकुळम जिल्ह्यातील वारापुळा येथे राहणाऱ्या श्रीजीत नावाच्या कार्यकर्त्याचा पोलिस कोठडीत मृत्यू झाला होता. एका व्यक्तीच्या मृत्यूच्या प्रकरणात केरळ पोलिसांनी श्रीजीत याला ताब्यात घेतले होते. मात्र पोलिसांच्या ताब्यात असतानाच एका रुग्णालयात त्याचा मृत्यू झाला होता. पोलिस कोठडीत झालेल्या अत्याचारांमुळेच त्याचा मृत्यू झाला असल्याचा आरोप श्रीजीतच्या नातेवाईकांनी केला होता. एर्नाकुळमच्या जिल्हा पोलिस उपअधीक्षकांवर त्या प्रकरणात ठपका ठेवण्यात आला आहे. सत्ताधारी पक्षाच्या एका नेत्यावरूनच त्याला अटक करण्यात आल्याची बोलवा आहे.


'आम्हाला केरळमधील पोलिस स्थानकांमध्ये दररोज अशा घटना पाहायला मिळतात. पक्ष कार्यकर्त्यांच्या (म्हणजे कोण हे सांगायला पाहिजे का?) एका फोन कॉलवर दलित आणि अन्य लोकांविरुद्ध पोलिस खटले दाखल करतात. स्थानिक माकप नेत्यांसोबत पोलिसांचे एवढे गूळपीठ आहे, की तुम्हाला त्यांचा पाठिंबा नसेल तर तुम्ही काहीही करू शकत नाही," असे धन्या रामन म्हणतात.


पोलिसांचे हे लालीकरण अशा थराला गेले, की पोलिस असोसिएशनच्या राज्य संमेलनात 50 पोलिस अधिकारी लाल रंगाचा शर्ट घालून गेले होते. तेथे त्यांनी डाव्या हुतात्मा नेत्यांना श्रद्धांजलीही वाहिली होती. हे सगळे पोलिस माकपचा गढ असलेल्या उत्तर केरळमधून आले होते.
याच राज्यात अट्टापडी नावाच्या जागी मधू नावाच्या आदिवासी युवकाला काही लोकांनी झाडाला बांधून त्याला मारहाण केली होती. तांदळाची चोरी करण्याचा त्याच्यावर आरोप होता. या मारहाणीत त्याचा मृत्यू झाला. याप्रकरणी ट्विट करताना क्रिकेट खेळाडू वीरेंद्र सेहवाग याने म्हटले होते, “केरळमध्ये मधूने केवळ एक किलो तांदूळ चोरला होता. यावरूनच उबेद, हुसेन आणि अब्दुलच्या गर्दीने त्या बिचाऱ्या गरीब आदिवासीला मारले. सभ्य समाजावरील हा कलंक आहे. हे घडूनही कोणालाही काहीही फरक पडत नाही, हा विचार करुन मला लाज वाटते.”


त्याहीपूर्वी फेब्रुवारी महिन्यात कन्नूर जिल्ह्यातील एस. पी. शोहेब या कार्यकर्त्याचा खून झाला होता. शोहेब हा तीस वर्षांचा होता. आपल्या मित्रांसोबत तो थांबलेला असताना चौघेजण कारमधून आले. त्यांनी आधी दहशत पसरविण्यासाठी बॉम्ब फेकला आणि त्यानंतर शोहेबवर तलवारीने वार केले, असे काँग्रेसच्या नेत्यांचे म्हणणे. तर शोहेबला माकपच्या कार्यकर्त्यांकडून धमक्या येत होत्या तसेच अलीकडेच त्याला एका खोट्या प्रकरणात अडकवून तुरुंगात पाठविण्यात आले होते, असे त्याच्या वडिलांनी म्हटले होते.


तेव्हाही मार्क्सवादी कार्यकर्त्यांनी ही हत्या केल्याचा आरोप कन्नूर काँग्रेसच्या नेत्यांनी केला होता. मे 2016 मध्ये पिनरायी विजयन यांच्या नेतृत्वाखालील सरकार आल्यानंतर राज्यात झालेली ही एकविसावी राजकीय हत्या होती. "पोलिसांचे हात बांधले आहेत. निष्पक्ष चौकशी करण्यात ते अपयशी ठरले आहेत. त्यामुळे विशेष तपास पथकाची स्थापना करुन त्यामार्फत या प्रकरणाचा तपास करावा," अशी मागणी केरळ काँग्रेसचे अध्यक्ष एम. एम. हसन यांनी तेव्हा केली होती. हे सर्व विस्ताराने सांगायचे कारण म्हणजे यातील कोणीही भक्त किंवा फॅसिस्ट नाही. पण अर्थात ते दिवसही लोकशाहीचे काळे दिवस नव्हते, की त्यामुळे देशातील असहिष्णुतेचा ज्वरही वाढला नव्हता.


रेल्वेत बसण्याच्या जागेवरून किंवा तत्सम किरकोळ कारणावरून मारहाण झाली, की मुस्लिम आणि दलितांना लक्ष्य करण्यात आल्याची बोंब ठोकणारी एक जमात अलीकडे निर्माण झाली आहे. अशा भाडोत्री आक्रोशकर्त्यांसाठी हे एक आव्हान आहे. दम असेल तर याही घटनेवर तेवढीच राळ उठवा, हिंमत असेल तर लालभाईंच्या अत्याचाराविरोधात बोला. येथे एक हत्या झालीय, त्यात दलित बळी पडला आहे...पण हे घडले ते राज्य तुमच्या डोळ्यात सलणारे नाही. ती तुम्ही आपले मानणाऱ्या राज्यात घडली आहे. आता दाखवा तुमचा कैवार आणि दाखवा इमान!

Tuesday, May 29, 2018

Kumaraswamy Rekindles Ugly Memories of Coalition Politics


Janata Dal Secular and Congress have managed to Grab the power in Karnataka pushing the Bharatiya Janata Party to the margin. H D Kumarswamy is in the Chief Minister's chair. However, with the coalition comes the ugly memories of 1990s when themes of the supporting parties ruled the roost while issues of governance where put on back burner.
Karnataka’s new CM H D Kumaraswamy's remark that he was at the "mercy" of Congress and not the people of state Signify the return of that era. With combined opposition parties coming together for the sake of fighting Narendra Modi and BJP, even as they are yet and decided over who would lead the pack, the chances of this kind of ‘obligatory’ politics become stark.
The Karnataka BJP leaders have flayed CM Kumarswamy saying that he was "deriding his own people" and doubted his credentials to serve them. However, their statement may fall under the ‘sour grape’ category. Surely, the statement of H D Kumaraswamy counts among the most brazen statements. It also signifies as to who would call the shots in this makeshift arranged that promises to last at least until next parliamentary elections.
Kumaraswamy had yesterday stated he was at the 'mercy' of the Congress, not the 6.5 crore people of the state. "Mine is not an independent government. I had requested the people to give me a mandate that prevents me from succumbing to any pressure other than you. But today I am at the mercy of the Congress. I am not under the pressure of the 6.5 crore people of the state," he had said.
The coalition governments have been part of Indian polity since the elections in 1967 when the Congress’s monopoly of power in the states was broken for the first time. It started an era of short-lived governments and politics of defection - both of which were induced by Congress. The opposition parties formed coalition governments that included Swatantra, Jan Sangh, BKD, Socialists and CPI. Though CPM did not join these governments, it actively supported them.
Even Congress also formed coalition governments in some of the states where it had been reduced to a minority. However, none of these governments was stable enough and could not stay in power for long. Interestingly, Congress party has always believed that coalition rule is a prescription for instability and that it alone can provide stable governance. It Actually ran an election campaign on the plank of stability when two successive governments led by VP Singh and Chandrashekhar could not complete their terms. Ironically, the one led by Chandrashekhar came into existence because Congress has had lent support to it and eventually took it back honor flimsy pretext.
It was Atal Bihari Vajpayee who for the first time led governments with large coalition of parties. But that was never a smooth ride even for a sagacious leader like Vajpayee.
Even a quick flashback would show the difficult road that the nation has traversed. A debilitating instability had gripped the Nation in the latter half of the 90s. The Congress was voted out of power in May 1996 and BJP, for the first time, emerged largest party in the 11th Lok Sabha. Vajpayee's first tenure as Prime Minister lasted only 13 days.
After pledging "unconditional" outside support "for full five years", the Congress party destabilized two United Front governments in less than two years - and that too on patently flimsy excuses. It actually showed the Congress party's contempt for coalition politics as it thought it could run the country on its own and smaller parties were a hindrance to its agenda.
Congress leaders pulled down the UF governments under the calculation that power would naturally be theirs after the early elections to the 12th Lok Sabha. In reality, the electorate handed a worse defeat to the Congress than in 1996 and gave an unambiguous mandate to Vajpayee. Even this bitter experience did not pursuade the power-hungry Congressmen to play power games and destabilize the government and eventually the nation. on the contrary, in the zeal to put their leader Sonia Gandhi, who had taken the baton just a year ago, they plotted pull down the NDA Government in April 1999. And brought it down with just one vote.
That forced yet another mid-term election on the nation and the outcome again was in favor of BJP. The Congress fared worse than before, the BJP did better than before and Vajpayee began his third term as Prime Minister, with a clearer and stronger mandate than before.
While achieving this, everyone knows what kind of tribulations Vajpayee had to undergo that ultimately impacted his performance as the Prime Minister. Since 2004, the Congress-led United Progressive Alliance ruled the country and its 10-year rule is known for loot, plunder and mismanagement.


With Narendra Modi's victory in 2014, that era of blackmailing in the guise of coalition had come to an end. Under his leadership, BJP formed single handed governments in one after another state. In states like Delhi and Bihar, BJP did not win but the governments where stable. in Bihar, it was this murky state of coalition that forced Nitish Kumar to switch sides and join the NDA.
All those memories returned with swearing in of Kumarswamy when sworn enemies embraced each other to fight the bigger foe. What price they will have to pay in return of guarantee for their survival can be gauged from the statement that Kumar Swami has made. And this is just the beginning. We are still in the trailer but it is enough to give an idea as to what the picture will likely be.

Friday, May 25, 2018

जोकर के हाथों में लोकतंत्र की लूट


कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री के रूप में एच. डी. कुमारस्वामी जब शपथ ग्रहण कर रहे थे उस समय पूरे देश के सभी गैर-मोदी दलों के नेता वहां एकत्र हुए थे। मंच पर ही एक दूसरे का हाथ थाम कर इन सब लोगों ने अपने एक होने का संकेत उनके समर्थकों को दिया। उस दृश्य ने बता दिया, कि पिछले 4 वर्षों से केंद्र तथा देश के अधिकांश राज्यों में जिस प्रकार से भाजपा का रोड रोलर चल रहा है उसका जोरदार जवाब देने की तैयारी विरोधियों ने की है।


इस शपथग्रहण समारोह में पांच राज्यों के मुख्यमंत्री उपस्थित थे। पश्चिम बंगाल में मुहर्रम के लिए दुर्गा पूजा पर पाबंदी लगानेवाली ममता बैनर्जी, आंध्र प्रदेश में तिरुपति देवस्थान पर ईसाई महिला की नियुक्ति करनेवाले चंद्रबाबू नायडू, तेलंगाना में मुस्लिमों को आरक्षण देने के लिए जिद पर अड़े हुए के. चंद्रशेखर राव, केरल में दूसरा अरबस्थान बनाने के लिए लालायित पिनराई विजयन और दिल्ली में नौटंकी को संस्थात्मक दर्जा दिलानेवाले अरविंद केजरीवाल ने इस मंच को चार चांद लगाए। चंद्रबाबू नायडू और चंद्रशेखर राव इनमें कितनी पटती है, यह सबको पता है लेकिन वे वहां हाजिर थे। इतना ही नहीं एक दूसरे के खून के प्यासे अखिलेश यादव और मायावती भी वहां हाजिर थे। अरविंद केजरीवाल को मानो तक सभी दलों ने जैसे अपने कुनबे से बाहर रखा था और उन्होंने भी भ्रष्टाचार निर्मूलन के पुरोधा के रूप में खुद को महिमामंडित किया था। लालू प्रसाद यादव के गले मिलकर भी उनका भ्रष्टाचार का पाखंड बदस्तूर जारी था। किसी समय कांग्रेस को जी भर कर कोसनेवाला यह भ्रष्टाचारविरोधी वीर वहां कांग्रेस की पंक्ति में बैठा था।


इस समारोह में जिन्होंने एक दूसरे का हाथ पकड़कर कांग्रेस का हाथ मजबूत करने का बीड़ा उठाया उन सब नेताओं के पास मिलकर आज की घड़ी में लोकसभा की 265 सीटें हैं। फिर भी इनमें महाराष्ट्र की शिवसेना नहीं थी। यह दीगर बात है, कि यह जमावड़ा एक दूसरे की कितनी मदद करता है, इसको लेकर आशंकाएं बरकरार है। इन्हें देखकर भाजपा नेताओं के माथे की रेखाएं बढ़ गई होगी इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। भाजप से नाराज रहे लोगों को अच्छा लगे इसलिए ये दोनों कुछ दिन के लिए चेहरे पर चिंता लेकर घूमेंगे भी।


भाजपा के विरोध में इस अभियान का शंखनाद करने के लिए सेकुलरों को कुमार स्वामी के राज्याभिषेक से बेहतर मुहूरत नहीं मिल सकता था। एक ओर पूर्ण बहुमत ना मिलने का मलाल भाजपा को सता रहा हो, बहुमत ना मिलने के कारण पद छोड़ने की आफत येदियुरप्पा पर आई हो, मोदी शाह के हाथों से लोकतंत्र की इज्जत बचा सके ऐसा रिसॉर्ट विरोधियों को हाल ही में मिला हो - संक्षिप्त में कहे तो भाजपा के
सारे घाव हरे हो ऐसे समय में यह शंखनाद किया गया।


पर इन सब लोगों को एकत्र लानेवाला शख्स कौन है? वह है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। सन 2014 के लोकसभा और उसके बाद के लगभग हर चुनाव में एक बात दिख चुकी है माहौल चाहे जैसा भी हो, एक बार मोदी के मैदान में उतरते ही सारा दृश्य बदल जाता है। कर्नाटक में भी भाजपा को सबसे ज्यादा सीटें मिली लेकिन इनमें से अधिकांश सीटें मोदी के करिश्मे का नतीजा है। पार्टी के किसी भी अन्य नेताओं को मतदान से संवाद साधने में सफलता नहीं मिली। येदियुरप्पा प्रभावशाली नेता जरूर है लेकिन भाजपा को अकेले के बूते सत्ता तक ले जाने की ताकत उनमें नहीं है यह फिर एक बार फिर साबित हो गया। कर्नाटक में मोदी अकेले भाजपा को 100 के पार ले गए यह बात भाजपा के लिए वास्तव में चिंता की बात है।


अगले एक वर्ष में लोकसभा का चुनाव है और भाजपा के अलावा बाकी सारे दलों का एक ही मलाल है, कि उनके पास मोदी नहीं है! सीधे जनता से बात करने वाला और उनके मत खींचने वाला चेहरा उनके पास नहीं है। फिर अपने अस्तित्व की आशंका से भयभीत विरोधियों के मन में एक बात ने पैठ जमा ली है, कि मोदी और भाजपा को टक्कर देने हो तो सभी भाजपा विरोधी दलों को एकत्र आना ही होगा। फुलपुर आदि उपचुनावों के नतीजों ने उनके मुगालते को और हवा दी है, हालांकि बड़े चुनावों के नतीजे कुछ और ही कहते हैं।


मजे की बात यह, कि जिस कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण के लिए ये लोग इकट्ठा हुए थे वह कहां एकत्रित विरोधियों के दम पर चुनकर आए थे। कर्नाटक में कांग्रेस और जीडीएस ने चुनाव सिर्फ अलग-अलग नहीं लढ़ा, बल्कि एक दूसरे पर आग उगलते हुए लड़ा था। लेकिन मतदाताओं का जनादेश खंडित रूप से आया और हताश कांग्रेस ने उत्साहित जीडीएस को तश्तरी में रखकर सत्ता सौंप दी।


विधान सौध के सीढ़ियों पर बने मंच पर आसीन इन नेताओं के मन में क्या विचार आते होंगे? पिछले तीन दशकों से देश की राजनीति कितनी अच्छी चल रही थी? प्रादेशिक दलों का जोर बढ़ रहा था, जिसके पास 5-10 विधायक या 15-20 सांसद हो वह नेता भी राज्य के मुख्यमंत्री या केंद्र में प्रधानमंत्री को घुटने टेकने पर मजबूर कर सकता था! सिर्फ अपनी जाति की गठरी संभलने की बात थी! कईयों के पोतो-पड़पोतों का का भी इंतज़ाम हो जाता था! कोई जेल में जाते समय अपनी बीवी को मुख्यमंत्री करता था, कोई रातोंरात इस दल से उस दल में जाता था या स्वाभिमान का दम देकर मंत्री पद हासिल करता था। इस पूरे तंत्र पर एक प्रहार किया मोदी नाम के व्यक्ति ने। दुष्ट व्यक्ति के विरोध में एकत्र आना ही होगा। लोकतंत्र बचाना ही होगा। मोदी नामक राक्षस को हराना ही है, ऐसा निश्चय उन्होंने किया होगा।


बैटमैन सीरीज की फिल्मों में से एक 'डार्क नाइट राइज़ेस' में आरंभ का एक दृश्य है। विलेन जोकर कई लोगों को साथ में लेकर बैंक पर डकैती डालने जाता है। उस समय सभी लोग जोकर के मुखोटे पहने हुए ही होते हैं। बैंक में प्रवेश करने के बाद ये लोग पहले वहां के लोगों को और कर्मचारियों को गोलियों से भूनते हैं। बाद में जैसे-जैसे रकम हाथ में आने लगती है वैसे वैसे ये सारे जोकर एक दूसरे को मारने लगते हैं। सबसे आखिर में पूरी रकम हाथ में हथियाने वाला जोकर (हीथ लेजर) हाथ आई लूट को लेकर भाग जाता है।



भारतीय लोकतंत्र की लूट ऐसे किसी जोकर के हाथ में ना पड़े तो गनीमत है।

Thursday, May 24, 2018

जोकरच्या हाती लोकशाहीची लूट


कर्नाटकचे नवीन मुख्यमंत्री म्हणून हरदनहळ्ळी देवेगौडा कुमारस्वामी हे शपथग्रहण करत होते त्यावेळी देशभरातील सर्व मोदीरहीत पक्षांची मंडळी तिथे एकत्र जमली होती. व्यासपीठावरच मानवी साखळी उभी करून या सर्वांनी आपण एकत्र येणार असल्याचे आपापल्या अनुयायांना संकेत दिले. गेली चार वर्षे केंद्र तसेच देशाच्या बहुतेक राज्यांमध्ये ज्या प्रकारे भाजपचा मोदीछाप रोडरोलर फिरत आहे, त्याला एक खमके उत्तर देण्याची तयारी विरोधकांनी केली आहे.


या शपथविधी समारंभात पाच राज्यांचे मुख्यमंत्री हजर होते. पश्चिम बंगालमध्ये मोहरमसाठी दुर्गोत्सवाच्या मिरवणुकीवर बंदी घालणाऱ्या ममता बॅनर्जी, आंध्र प्रदेशात तिरुपती देवस्थानावर ख्रिस्ती महिलेची नियुक्ती करणारे चंद्राबाबु नायडू, तेलंगाणात मुस्लिमांना आरक्षण देण्यासाठी इरेला पेटलेले चंद्रशेखर राव, केरळमध्ये प्रति-अरबस्थान निर्माण करण्याचा विडा उचललेले पिनराई विजयन आणि दिल्लीत नौटंकीला संस्थात्मक स्वरूप प्राप्त करून देणारे अरविंद केजरीवाल यांनी या व्यासपीठाला शोभा आणली होती. चंद्राबाबु नायडू आणि तेलंगाणाचे चंद्रशेखर राव यांचे सख्य जगजाहीर आहे. पण ते तिथे हजर होते. इतकेच कशाला, एकमेकांचे हाडवैरी असलेले अखिलेश यादव आणि मायावती हेही तिथे हजर होते. अरविंद केजरीवाल यांना आजवर सर्व राजकीय पक्षांनी काहीसे गावकुसाबाहेर ठेवलेले आणि त्यांनीही भ्रष्टाचारनिर्मूलन शिरोमणी या नात्याने आपले सोवळे टिकवून ठेवले होते. अगदी लालूप्रसादांना मिठी मारल्यानंतरही त्यांचा हा भ्रष्टाचारनिर्मूलनाचा दंभ गेलेला नव्हता. एकेकाळी काँग्रेसला करकचून शिव्या घालणारा हा शुद्धीबहाद्दर तिथे काँग्रेसच्या पंक्तीत मानाने बसला होता.
या समारंभात ज्यांनी एकमेकांचा हात धरून काँग्रेसचा हात मजबूत करण्याचा प्रण केला, त्या सर्व नेत्यांकडे मिळून आजच्या घडीला लोकसभेच्या 265 जागा आहेत. तरीही यात महाराष्ट्रातील 'सत्तारोधी' शिवसेना नव्हतीच. हा गोतावळा आता एकमेकांना किती मदत करतो, हे येणारा काळच ठरवेल. बिनभाजपी नेत्यांची ही गर्दी पाहून मोदी-शहा आणि भाजपी नेत्यांच्या कपाळावर आठ्या उमटल्या असतील तर त्यात नवल नाही. भाजपवर खप्पामर्जी असलेल्यांना बरे वाटावे म्हणून ही जोडगोळी काही दिवस चेहऱ्यावर चिंता मिरवतीलही.


भाजपविरोधातील या मोहिमेचा शंखनाद करण्यासाठी सेक्युलरांना कुमारस्वामीच्या राज्याभिषेकापेक्षा आणखी चांगला मुहूर्त शोधूनही सापडला नसता. पूर्ण बहुमत न मिळाल्याची खंत भाजपला भंडावणारी. येडियुरप्पांना बहुमत न मिळाल्यामुळे पद सोडण्याची नामुष्की आलेली. मोदी-शहांच्या हातून लोकशाहीची अब्रू वाचवू शकेल असा रिसॉर्ट विरोधकांना नुकताच सापडलेला. थोडक्यात म्हणजे भाजपच्या सर्व जखमा ताज्या-ताज्या असतानाच हा शंखनाद करण्यात आला.


पण मुळात विळ्या-भोपळ्यांची ही मोट घालणारा मूळ शेतकरी कोण आहे? तो आहे पंतप्रधान नरेंद्र मोदी. वर्ष २०१४ची लोकसभा आणि त्यानंतरच्या जवळपास प्रत्येक निवडणुकीत एक गोष्ट दिसून आलीय, की वातावरण भले कसेही असो, मोदी एकदा रणांगणात उतरले की संपूर्ण चित्र बदलून जाते. अगदी कर्नाटकातही भाजपला सर्वात जास्त मिळाल्या, परंतु त्यातील बहुतेक जागा या मोदींच्या करिष्म्याचा परिणाम आहे. पक्षाच्या अन्य कुठल्याही नेत्याला मतदारांशी तसा संवाद साधता आलेला नाही. येडियुरप्पा हे प्रभावशाली नेते जरूर आहेत, परंतु एकहाती भाजपला सत्तेपर्यंत नेण्याचे सामर्थ्य त्यांच्यात नाही, हे पुनः पुनः सिद्ध झाले आहे. मोदींनी एकट्याने भाजपला शंभरीपार नेले ही भाजपसाठी खरे तर चिंतेची बाब आहे.


येत्या एक वर्षात लोकसभेची निवडणूक आहे आणि भाजपशिवाय झाडून साऱ्या पक्षांचे एकच दुखणे आहे – त्यांच्याकडे मोदी नाही! थेट जनतेशी संवाद साधणारा आणि त्यांची मते मिळवू शकेल, असा चेहरा त्यांच्याकडे नाही. मग अस्तित्वाचा प्रश्न भेडसावणाऱ्या विरोधकांनी मनाशी एक गोष्ट ठरवून टाकलीय - मोदी आणि भाजपला टक्कर द्यायची असेल तर भाजपविरोधी सर्व पक्षांनी एक यायला पाहिजे. फुलपूर इत्यादी ठिकाणच्या पोटनिवडणुकांनी त्यांच्या या समजाला खतपाणी घातलेय – अर्थात मोठ्या निवडणुकांच्या फलिताचे इंगित काही वेगळेच आहे. गंमत म्हणजे ज्या कुमारस्वामींच्या शपथविधीसाठी ते जमले होते ते तरी कुठे एकत्रित विरोधकांच्या जीवावर निवडून आले होते? कर्नाटकात काँग्रेस आणि धर्मनिरपेक्ष जनता दलाने निवडणूक वेगवेगळीच लढली नव्हती तर एकमेकांवर आग ओकत लढली होती. पण मतदारांचा जनादेश खंडीत आला आणि कातावलेल्या काँग्रेसने हरखलेल्या जेडीएसला सत्तेचे आवतण दिले.


विधानसौधाच्या पायऱ्यांवर व्यासपीठावर बसलेल्या या सगळ्या मंडळींच्या मनात काय असेल? गेली तीन दशके देशातील राजकारण किती छान चालू होते. प्रादेशिक पक्षांचा जोर वाढत होता. ज्याच्याकडे 5-10 आमदार किंवा 15-20 खासदार तो नेतासुद्धा राज्यात मुख्यमंत्र्याला आणि केंद्रात पंतप्रधानाला नाकदुऱ्या काढायला लावत होता. आपापल्या जातीचे गठ्ठे एकत्र केले, की झाले! अनेकांची नातवा-पतवंडांपर्यंतची नेतृत्वाची सोय व्हायची. कोणी तुरुंगात जाताना आपल्या बायकोला मुख्यमंत्री करायचा, कोणी रातोरात या पक्षातून त्या पक्षात जायचा. कोणी स्वाभिमानाच्या बेडकुळ्या काढून वट्ट मंत्रिपदे मिळवायचा. त्या सर्वांवर घाला घातला तो या मोदी नावाच्या माणसाने.


अशा या दुष्ट माणसाच्या विरोधात एकत्र यायलाच पाहिजे. लोकशाही वाचली पाहिजे. "लोकशाही ही ऊवांना मिळालेली सिंहाला खाण्याची शक्ती असते," असे जॉर्ज क्लेमेंच्यू या लेखकाने म्हटले आहे. आपल्याला मिळतील तिथून उवा-पिसवा गोळा करू आणि मोदी नावाच्या राक्षसाला हटवू, असा निश्चयच त्यांनी केला असेल.



बॅटमन मालिकेच्या एका चित्रपटात (बहुतेक डार्क नाईट रायझेस) सुरूवातीचे दृश्य होते. खलनायक जोकर हा अनेकांना घेऊन बँकेवर दरोडा घालायला जातो. त्यावेळी सर्वांनी जोकरचेच मुखवटे घातलेले असतात. बँकेत शिरल्यावर ही मंडळी आधी तेथील लोकांना व कर्मचाऱ्यांना गोळ्या घालतात. नंतर जसजशी रक्कम हातात येऊ लागते तस तसे हे सर्व जोकर एकेकाला गोळ्या घालायला लागतात. सर्वात शेवटी संपूर्ण रक्कम एकहाती मिळालेला जोकर (हीथ लेजर) मिळालेली लूट घेऊन पोबारा करतो.


भारतीय लोकशाहीची लूट अशा जोकरच्या हाती पडण्याची वेळ येऊ नये म्हणजे मिळविली.

Monday, May 21, 2018

कर्नाटक का नाटक अभी बाकी है


कर्नाटक के नाट्य के पहले अंक का पटाक्षेप भाजपा को मिले हुए झटके से हुआ है। सत्ता सोपान के सबसे उंचे पायदान से उसे नीचे उतरना पड़ा है और वह भी बड़े बेआबरू होकर - सिर्फ आठ विधायक न मिलने की वजह से। कईयों का कहना है, बल्कि अधिकांश लोगों का कहना है, कि भाजपा को अव्वल तो सरकार गठन का दावा ही नहीं करना चाहिए था। लेकिन वह किया गया। कांग्रेस और जेडी (एस) के कुछ विधायकों को खरीदने का उसका इरादा काम नहीं आया - राजनीति में सफलता केवल इरादे और हौसलों से नहीं मिलती। भाग्य का साथ भी चाहिए। इस बार भाग्य डी. के. शिवकुमार नामक नेता के रूप में आड़े आया। कर्नाटक में त्रिशंकु विधानसभा के नतीजे आने के बाद से ही कांग्रेस ने शिवकुमार को कांग्रेसी विधायकों को एक साथ रखने की जिम्मेदारी सौंप दी थी। बेंगलुरु के ईगलटन रिसॉर्ट से लेकर हैदराबाद तक और फिर वहां से विधानसभा तक कांग्रेसी विधायकों को पहुंचाने की जिम्मेदारी को शिवकुमार ने सफाई से अंजाम दिया। यहां तक कि जब ईगलटन रिसॉर्ट में पुलिस हटा ली गयी तब भी शिवकुमार ने कहा कि कांग्रेस के विधायकों की सुरक्षा पर कोई खतरा नहीं है।
भाजपा शायद अपने मनचाहे विधायकों को पटा भी लेती, अगर मंत्रि पद और धन का टोटका चला लेने के लिए वे उपलब्ध रहते। लेकिन कांग्रेस और जेडी (एस) ने उन्हें इस तरह बंदी बना लिया था, कि भाजपा का संदेश उन तक पहुंच ही नहीं पाया। उन्होंने अपने विधायकों को बंद कर दिया था और उनके मोबाइल फोन तक जब्त कर लिए थे।
भाजपा के लिए वज्राघात तो उसी समय हो गया था जब उच्चतम न्यायालय ने बहुमत की परीक्षा के लिए अवधि 15 दिनों से घटाकर केवल 24 घंटे तक कर दिया था। अमित शाह की चर्चित और अप्रत्याशित चालें चलने के लिए भाजपा को मौका ही नहीं मिला। जब यह साफ हो गया, कि पार्टी बहुमत से दूर है और अंतिम रेखा को छून की ताकत उसमें नहीं है, तब बी. एस. येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद का इस्तीफा दे दिया। हालांकि उससे पहले उन्होंने विधानसभा में भावनात्मक भाषण देकर अपना पक्ष भी रखा। उस भाषण को सुनने के बाद लगा, कि विधानसभा के लिए प्रचार चुनाव के साथ समाप्त नहीं हुआ बल्कि वह सभागार में पहुंच गया है।


इस अंक की समाप्ति के बाद नाटक का दूसरा अंक शुरू हुआ है। राज्यपाल वजुभाई वाला ने जेडी (एस)-कांग्रेस गठबंधन के नेता एच. डी. कुमारस्वामी को आमंत्रित करने में कोई समय नहीं गंवाया। अब नई सरकार बुधवार को शपथ ग्रहण करेगी। और अब कर्नाटक की जनता के होठों पर एक ही सवाल है - यह सरकार कितने दिन चलेगी?
इस सरकार के अंतर्विरोध किसी से छुपे नहीं है। दोनों दलों ने न सिर्फ एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा, बल्कि पूरी कड़वाहट के साथ लढ़ा। ऐसे में इन दोनों का एकत्र आना एक विडंबना से कम नहीं है। किसी तिसरे को रोकने के लिए दोनों दलों ने भले ही एक दूसरे के गले लगाया है, लेकिन उनकी हाथों में वे छुरे अभी भी कायम है जो उन्होंने चुनाव के दौरान एक दूसरे पर चलाए थे। उस पर तुर्रा यह, कि मुख्यमंत्री के अपने सदस्य उसे समर्थन देनेवाले दल से आधे से भी कम है। भाजपा को किसी भी तरह से सत्ता तक पहुंचने से रोकने के लिए कांग्रेस ने बहुत ही सस्ते में खुद का सौदा किया है।
खुद को गैर-सांप्रदायिक कहलानेवालों का उम्मीदभरा अनुमान यह है, कि भाजपा के डर के चलते ये कांग्रेस और जेडीएस लंबी अवधि तक गृहस्थी चला सकेंगे। ऐसे लोगों को कुमारस्वामी का इतिहास या तो पता नहीं या वे उससे आंखे मूंद लेना चाहते है। कुमारस्वामी और देवेगौड़ा भारत के उन राजनीतिक चरित्रों में से है जिनकी गिनती नितांत अवसरवादियों में की जा सकती है। कुमारस्वामी को किसी विचारधारा से लेना देना नहीं है। कांग्रेस के सहारे सत्ता के शिखर पर पहुंचने के बाद वे अगर कांग्रेस के असहज महसूस करने लगे तो पाला बदलकर भाजपा के साथ भी आ सकते है। ऐसे में भाजपा भी उन्हें समर्थन देने से नहीं कतराएगी क्योंकि जो खेल कांग्रेस ने खेला क्या वह भाजपा नहीं खेल सकती? कर्नाटक के खजाने से भाजपा को दूर रखने के लिए अगर कांग्रेस जेडीएस के सामने गिडगिडा सकती है तो क्या भाजपा जेडीएस को सहारा नहीं दे सकती?
इसके साथ ही यह उम्मीद करना, कि विरोधी भाजपा, जिसके सदस्य लगभग इन दोनों दलों के कुल सदस्यों जितने है, हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेगी। यह वह भाजपा है जिसके मूंह सत्ता का खून लग चुका है। कश्मीर से लेकर कर्नाटक तक वह हर जगह अपना झंडा गाड़ने की ताक में रहती है। जिस पार्टी के पास रेड्डी भाईयों से विधायकों के शिकारी हो, उसके लिए आंकडों का इंतजाम महज़ समय का सवाल है।
और कांग्रेस का यह चरित्र रहा है, कि जिस दल को उससे समर्थन मिला है उसकी सरकार कभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई। इसका सबसे प्रखर उदाहरण तो कुमारस्वामी के पिता देवेगौड़ा ही है जिन्हें कर्नाटक से उठाकर प्रधानमंत्री बनाया गया था और एक वर्ष के भीतर सत्ताविहीन किया गया था।
तो इसमें क्या शक, कि कांग्रेस जैसे बेवफा सहयोगी और भाजपा जैसे सत्ताकांक्षी विरोधी के चलते कुमारस्वामी सरकार एक पल के लिए भी स्थिर महसूस नहीं करेगी। हां, इतना जरूर है, कि भाजपा के विजय अभियान से हताशाग्रस्त और विरोधियों की एका का सपना बुननेवाले लिबरलों के लिए यह कुछ समय के लिए जरूर उम्मीद पैदा करेगी।

Thursday, May 10, 2018

युवराज का इरादा, कर्नाटक का अड़ंगा


आखिर राहुल गांधी ने जता दिया, कि कांग्रेस को बहुमत मिलने पर प्रधानमंत्री बनने की उनकी तैयारी है। राजनीति में उतरने के बाद 14 वर्षों तक लूका-छिपी खेलने के बाद आखिर उन्हें पता चला, कि रण में उतरना है तो सिंहासन का लक्ष्य रखना लाजिमी है। यह पहली बार है, कि कांग्रेस के युवराज ने किसी भी तरह की जिम्मेदारी उठाने के लिए हामी भरी है। वरना अब तक वे सत्ता को विष बताकर राजनीतिक उपवास करते रहे जिसके तहत उनके पास कोई कुर्सी तो नहीं थी लेकिन अधिकार बराबर रहते थे।
कर्नाटक के पत्रकारों ने उन्हें पूछा था, कि यदि सन 2019 में कांग्रेस सबसे बडी पार्टी बनकर उभरी तो क्या वे प्रधानमंत्री बनेंगे? उसे उत्तर देते हुए उन्होंने एक सकारात्मक जवाब दिया। इस कदम को उनके बढ़े हुए आत्मविश्वांस का भी प्रतीक माना जा सकता है और उनकी मजबूरी का भी। आखिर वे अब कांग्रेस अध्यक्ष है और जिस तरह के परिवारवादी ढर्रे पर कांग्रेस चलती है, उसके चलते उनके अलावा कांग्रेस के पास अन्य कोई विकल्प है नही। कांग्रेस ने जब 2004 में बहुमत प्राप्त किया था, उस समय सोनिया गांधी के पास प्रधानमंत्री बनने का अवसर था लेकिन उनके इतालवी जन्म के कारण वे पद पर आसीन नहीं हो सकी। राहुल के संदर्भ में ऐसी कोई बाधा नहीं है। इसलिए अगर सचमुच कांग्रेस यह चमत्कार कर भी पाए, तो राहुल के अलावा कोई और नाम तो कांग्रेस के पास है नहीं। जब उखली में सर दिया तो मुसल से क्या डरना, इस कहावत के अनुरूप फिर युवराज ने भी ताल ठोंक दिया है। हालांकि, कौन प्रधानमंत्री बनना चाहता है और नहीं, यह फिलहाल मुद्दा नहीं है।
मुद्दा यह है, कि राहुल गांधी के इस आत्मविश्वा सपूर्ण पैंतरे में एक शर्त है। उनकी यह तैयारी एक इच्छा बनी रहेगी क्योंकि अगर उसे पूरी होनी है, तो कांग्रेस को 201 9 में लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना होगा। पिछले कुछ वर्षों में का इतिहास स्पष्ट बताता है, कि यह संभव नहीं है। यदि राहुल की इच्छा पूरी होती है, तो यह उनकी मेहनत और नीति का नतीजा नहीं बल्कि भाग्य का चक्र कहा जाएगा।
उनकी इस चुनौतीपूर्ण घोषणा में जान तभी आएगी अगर्चे उनकी पार्टी कर्नाटक में कुछ दम दिखा सकें। कांग्रेस अपने बूते पर किसी राज्य में बहुमत प्राप्त कर सकें, यह राहुल के लिए अपने नेतृत्व का सिक्का मनवाने की पहली शर्त है। कांग्रेस में उनका नेतृत्व बेरोकटोक चल सकता है, क्योंकि उस पार्टी की मानसिकता ही सामंतवादी और परिवारवादी हो चुकी है। लेकिन सन 2019 के चुनावों के लिए जब कांग्रेस दूसरे दलों के साथ साझेदारी करना चाहती है ऐसे में अपने नेतृत्व गुण निर्विवाद रूप से साबित करना राहुल के लिए महत्वपूर्ण है। उनके राजनीतिक अस्तित्व की यह पहली कसौटी है। और उनकी पाटी इस मामले में अब तक कोरी रही है।





इस वर्ष कर्नाटक के बाद छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदी राज्यों में भी चुनाव है। लेकिन वैसा दमदार प्रदर्शन करने से पहले कांग्रेस को कर्नाटक की परीक्षा पास करनी होगी। राहुल के कांग्रेस उपाध्यक्ष रहते कांग्रेस 10 से अधिक राज्यों में चुनाव हार गई है। उनके कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद भी हार का सिलसिला जारी है। भाजपा "दागी विरासत, सामंती सियासत" का नारा देकर कांग्रेस को घेरती आई है। हाल के दिनों में प्रधानमंत्री मोदी ने इस संघर्ष को नामदार बनाम कामदार का रूप दिया है। इसलिए कर्नाटक के चुनावों पर राहुल गांधी और कांग्रेस का भावी निर्भर है। यह वह राज्य है जो राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है और कांग्रेस के पाले में एकमात्र बड़ा राज्य है। अगर भाजपा वहां जीतती है तो उसके दक्षिण में विजय अभियान में रास्ते खुले हो जाएंगे। अगर कांग्रेस वहां अपनी सत्ता कायम रखती है तो माना जाएगा, कि वह एक गंभीर राजनीतिक खिलाड़ी है जिससे 2019 में उसकी चुनौती को भी गंभीरता से लिया जाता है। अगर सत्ता उसके हाथ से गई तो तृणमूल कांग्रेस और एनसीपी जैसे दल उस पर हावी हो जाएंगे। तृणमूल की ममता बैनर्जी ने तो वैसे भी कांग्रेस को 1-1 सीट बंटवारे का प्रस्ताव दिया है। राहुल गांधी ने अब तक ऐसा कुछ भी नहीं किया है, कि ये सारे क्षत्रप उनके झंड़े के तले एकत्र आएंगे।
कांग्रेस ने यह मुगालता पाल रखा है, कि प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार के विरुद्ध लोगों में आक्रोश है और वह उसे अपने आप सरकार तक पहुंचा देगा जिससे युवराज स्वयं राजा बन जाएंगे। जबकि भाजपा और कांग्रेस दोनों से समान दूरी बनाए रखना चाहनेवाले अन्य विपक्षी दल तीसरे मोर्चे या फेडरल फ्रंट की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने पहले ही बिना लाग-लपेट के बता दिया है, कि राहुल के तहत काम करने में उन्हें जरा भी रूचि नहीं है। इसलिए राहुल को यह सुनिश्चित करना होगा, कि उनकी पार्टी 201 9 में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरती है। पिछले कुछ वर्षों में उनके ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए यह न के बराबर लगता है।
राहुल की मंशा पर पानी फेरनेवालों में एनसीपी प्रमुख शरद पवार सबसे आगे है। पवार से जब पूछा गया कि राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के सपने पर उनकी क्या राय है तो उन्होंने कहा कि अभी यह कहना सही नहीं, किसकी कितनी सीट आएंगी। यह तो अभी कोई पक्के तौर पर नहीं बोल सकता है। पवार मानते है, कि अगर 2019 में गठबंधन की सरकार बनी तो कांग्रेस के समर्थन से वह पीएम की कुर्सी पर दावेदारी जता सकते हैं। और बाकी के क्षत्रप भी कमोबेश यही मानते है।
बहरहाल, राहुल ने अपने पत्ते तो खोल दिए है। अब आगे देखना है, कि कर्नाटक का ऊंट किस करवट बैठता और युवराज का अभियान किस दिशा में बढ़ता है।

Friday, April 27, 2018

Can Shiv Sena Go It Alone?


The Shiv Sena, the party sulking for last almost four years, has decided to field its two candidates for the Nashik and Raigad-Ratnagiri-Sindhudurg local authorities constituencies for the Maharashtra Legislative Council elections. It effectively reinforces its stand to have no truck with Bharatiya Janata Party, its longtime ally and presently its bête noire. The election is scheduled to be held next month. A total of six local authorities constituencies would go to polls on May 21.
The politics in Maharashtra for the last few days has been marked by the overtures by BJP to form an alliance with Shiv Sena.Uddhav Thackeray, the executive president of Shiv Sena, announced earlier this year that the party would contest all future elections alone. The announcement was the culmination of a long drawn verbal duel between the two saffron parties. Ever since BJP rode to power, successively at the centre and in state, it rubbed its long time ally wrong way. In its zeal to acquire power on its own, BJP behaved with an aggressive high handedness that offended the party that have endured many a tempests together in over three-decade long journey.
Now the time has come for Shiv Sena to pay in the same coin. Its latest move is viewed as a snub to the BJP’s overtures. The Sena has announced Narendra Darade and Rajeev Sable for Nashik and Raigad-Ratnagiri-Sindhudurg constituencies, respectively as its candidates.The question is - can Shiv Sena maintain the momentum and pay the price of fighting its battles alone. The party may claim that it has a statewide presence but in reality, it is clustered in Mumbai, Konkan and to an extent Paschim (Western) Maharashtra area. Its support mainly from the urban areas. A large base of cadre has migrated first to the Maharashtra Navnirman Sena and now to BJP.
On the part of BJP, it indulged itself in many misadventures post-2014. Many of those misadventures actually paid dividends. However, the sense of realpolitik came soon and it started looking for mending fences with Shiv Sena. The BJP leaders including Chief Minister Devendra Fadnavis, Finance Minister Sudhir Mungantiwar and others have made no bones about their willingness to form an alliance with Shiv Sena. Even though Shiv Sena has resolutely said time and again that it will go alone, no one in political circles believed it. Shiv Sena clinging to power both in Centre as well as in state was seen as its fallibility.
uddhav thackeray devendra fadnavisIn fact BJP wants an alliance not only for this election to Legislative Council but also for next Lok Sabha and Assembly elections. Shiv Sena leadership has not only neglected those overtures, but discarded them out rightly. However, the changing dynamics of Maharashtra politics may force the party to have rethink of its steadfast and adamant stand.
The Congress and NCP that fought alone in last assembly election, against each other and against BJP as well as Shiv Sena also, are now coming closer. They have given enough signals that they may jump in the arena next time as one entity even at the national level. Congress leadership in the form of Rahul Gandhi and NCP (Sharad Pawar) have held meetings and deliberated on possible alliance. Since BJP has acquired many incomers from these parties. it may face no problem in facing the onslaught of combined strength of these parties. Moreover, it also has cadre that is already buoyed by successive victories of BJP in all levels of election. Shiv Sena can't claim this type of comfort.
Moreover, CM Fadnavis has very shrewdly given prominence to MNS leader Raj Thackeray who is seen reviving his party’s lost fortune. By attacking Narendra Modi and Fadnavis as well, Raj Thackeray has tried to occupy opposition space that has been laying vacant due to the lackluster performance by Congress and NCP as opposition parties. Shiv Sena tried to play double game by being in power and at the same time being an opposition party. However, this plan did not work out very well. this was clear by its underperformance in elections after elections. So much so that it was humiliated in its own citadel Mumbai during the municipal election.
Shiv Sena’s strategy seems to rely on capitalizing on anti-incumbency factor and the anger over betrayal (by BJP). However, this anti-incumbency thing is a very dicey preposition - except for media and politically enthused social media circles, this factor has not been especially evident anywhere in the state. Again, this factor will benefit, if at all, to Congress NCP and not Shiv Sena because it was an equal partner in whatever the present government did or did not.
In such a scenario, Shiv Sena’s muscle flexing may actually backfire on it. The move may alienate it's sympathizers and may erode of its voter base. For a solid display and exhibition of political strength, it may be a right move but for a long term gain and goodwill it may prove counterproductive.

Thursday, April 26, 2018

ये धब्बे ऐसे धुलनेवाले नहीं!


कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने आखिर वह बात कबुल ही ली जिसे उनकी पार्टी लगातार नकारते आई है। खुर्शीद ने कांग्रेस को उसका वह दामन दिखा दिया जिससे वह कभी छुटकारा नहीं पा सकती। यह दीगर बात है, कि खुर्शीद ने कांग्रेस के दामन पर सिर्फ मुस्लिमों के खून के धब्बे होने की बात कही थी, जबकि सच यह है, कि उसका दामन मुस्लिम, हिंदू, सिक्ख ऐसे सभी जातियों और प्रांतों के लोगों के खून से सना है।
अपने दामन पर मुसलमानों के "खून के धब्बे" होने की बात कहकर खुर्शीद ने कांग्रेस को सकते में डाल दिया था। रविवार को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के डॉ. बीआर आंबेडकर हॉल में उन्होंने यह बात कही थी। और तबसे कांग्रेस बगलें झांक रही है। उनकी बात से पार्टी नेताओं के कान खड़े हो गए। कार्यकर्ताओं (बचे-खुचे) को काटो तो खून नहीं!
"1947 मे स्वतंत्रता के बाद हाशिमपुरा, मलियाना, मेरठ, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, भागलपुर, अलीगढ़, बाबरी मस्जिद आदि में मुसलमानों के नरसंहार में कांग्रेस पर मुसलमानों के खून के जो इतने सारे धब्बे हैं इनको आप किन शब्दों से धोना चाहेंगे," खुर्शीद से यह सवाल पूछा था एएमयू के एक निलंबित छात्र आमिर मिंटोई ने।
इस पर खुर्शीद ने कहा, ‘‘यह राजनीतिक सवाल है। हमारे दामन पर खून के धब्बे हैं। कांग्रेस का मैं भी हिस्सा हूं तो मुझे मानने दीजिये कि हमारे दामन पर खून के धब्बे हैं। क्या आप यह कहना चाहते हैं कि चूंकि हमारे दामन पर खून के धब्बे लगे हुए हैं, इसलिए हमें आपके ऊपर होने वाले वार को आगे बढ़कर नहीं रोकना चहिए?‘‘
कांग्रेस प्रवक्ता पी. एल. पुनिया ने कहा है, कि कांग्रेस पार्टी सलमान खुर्शीद के बयान से पूरी तरह अलग करती है। सलमान खुर्शीद पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं, लेकिन जो बयान उन्होंने दिया है उससे कांग्रेस की असहमति है।
आखिर कांग्रेस ऐसे कितने मामलों से पल्लू झाड़ते रहेगी? आजादी से पहले और आजादी के बाद भी कांग्रेस ने हर वर्ग विशेष को लक्ष्यित करते हुए अत्याचार किए है। कांग्रेस एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसने समाज के सभी वर्गों और लोगों को एकसमान प्रताडित किया है। शुरूआत तो बंटवारे के साथ ही हुई थी। उस वक्त पाकिस्तान से आए हिंदुओं को प्रताडित किया गया। अकेले महाराष्ट्र में ही ऐसी कई घटनाएं गिनाई जा सकती है।
उसके बाद महात्मा गांधी की हत्या के बाद आक्रोश के नाम पर कांग्रेसियों ने महाराष्ट्र में ब्राह्मणों पर अत्याचार किए। उनके घर फूंके, उन्हें अपने निवास और गांव से बेदखल किया। आलम यह है, कि पश्चिम महाराष्ट्र में आपको कई देहात ऐसे मिलेंगे जिनमें ब्राह्मण नहीं है। क्योंकि कांग्रेसियों के डर से समय ब्राह्मणों का बड़ी संख्या में पलायन हुआ। मान लिजिए, कि 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में जो हुआ उसका वह पहला प्रयोग था।






लगभग एक दशक बाद यही कांग्रेस सरकार थी जिसने संयुक्त महाराष्ट्र के लिए आंदोलन करनवाले बेकसूर लोगों पर गोलियां बरसाई। उस आंदोलन में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में सरकार ने पूरा बलप्रयोग किया और 105 लोगों की जानें ली। ये लोग कौन थे? ये हर वर्ग, हर जाति के लोग थे।
इसी कांग्रेस के लोगों ने मराठवाडा में नामांतरण आंदोलन के नाम पर दलितों पर अत्याचार किए। तत्कालीन मराठवाडा विश्वविद्यालय का नाम बदलकर डा. बाबासाहब आंबेडकर विश्वविद्यालय करने की मांग दलित गुटों ने की थी। इसका विरोध करनेवाले गुटों में हालांकि शिवसेना जैसी पार्टियां भी ती लेकिन उनमें कांग्रेसी लोग अधिकतर थे। गांव-देहातों के दलितों का खून बहाया गया, कई जगहों पर सरकारी संपत्ति का नुकसान हुआ।
छिटपुट दंगों और झड़पों का तो जिक्र न करें तो ही बेहतर है। कांग्रेस ने किस-किसको अपना विरोधी नहीं बनाया? क्या कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हिंदूओं को "भगवा आतंकी" नहीं बताया था? क्या कांग्रेस ने कश्मीर से पंडितों के निष्कासन को मौन संमति नहीं दी? क्या कांग्रेस ने श्रीलंका के तमिल गुटों को पहले सहयोग देकर फिर उनसे किनारा नहीं किया? क्या कांग्रेस ने सिक्खों के अलगाववाद को चिंगारी देकर फिर उसे बुझाने की कोशिश नहीं की।
तो यह दामन खून ही खून से लथपथ पड़ा है। यह धब्बे ऐसे धुलनेवाले नहीं है, क्योंकि आप एक सिरो पर धोने की कोशिश करते हो तो दामन का दूसरा सिरा खून से और रंग जाता है। समझ लिजिए खुर्शीद साहब!

Monday, April 23, 2018

हरावे कसे, हे काँग्रेसने शिकावे


देशाच्या राजकारणात काँग्रेसचे स्थान आणि प्रभाव अनन्य आहे. देशाच्या कानाकोपऱ्यात त्याचे अस्तित्व आणि प्रभाव आहे. आता ही गोष्ट खरी, की हा प्रभाव आणि हे अस्तित्व अभूतपूर्व प्रमाणात कमी झाले आहे. तरीही, आपल्या पूर्वीचे गतवैभव प्राप्त करण्याइतके नसले तरी एक सन्माननीय, उल्लेखनीय स्थान परत मिळविण्याची त्याची क्षमता निश्चित आहे.
या पार्श्वभूमीवर काँग्रेसची केविलवाणी नाटके अधिकच दयनीय वाटू लागतात. त्यातून दिसून येते ती पक्षाची पराभूत मानसिकता - जणू आपला राजकीय संघर्ष राजकीय किंवा निवडणुकीय आखाड्यामध्ये करण्याची इच्छाशक्तीच हा पक्ष हरवून बसला आहे आणि त्याऐवजी घटनात्मक संस्थांना संशयाच्या घेऱ्यात आणण्याचा मार्ग तो पत्करत आहे. भारताचे सरन्यायाधीश दीपक मिश्रा यांच्याविरोधात जी चिखलफेक काँग्रेसने आरंभली आहे त्यातून त्याचे किती अधःपात झाले आहे, हे दिसून येते.
उपराष्ट्रपती आणि राज्यसभा अध्यक्ष एम. व्यंकय्या नायडू यांनी मिश्रा यांच्या महाभियोगासाठी विरोधी पक्षांनी दिलेली नोटीस फेटाळून लावली. सात विरोधी पक्षांनी गेल्या आठवड्यात ही नोटीस दिली होती. त्यात सरन्यायाधीशांच्या "गैरवर्तना"चे पाच आधार दिले होते. अन् या विरोधी पक्षांचे नेतृत्व करत होती काँग्रेस!
सोहराबुद्दीन शेख बनावट चकमक प्रकरणाची सुनावणी करणारे न्यायाधीश बी. एच. लोया यांच्या मृत्यूची निष्पक्ष चौकशीची मागणी करणारी याचिका सर्वोच्च न्यायालयाने फेटाळून लावली. त्यानंतर एका दिवसाने महाभियोगाची ही नोटिस देण्यात आली होती.
ही नोटिस फेटाळून लावण्याचा निर्णय घेण्यापूर्वी नायडू यांनी ज्येष्ठ कायदातज्ञांशी व घटनातज्ञांशी चर्चा केली. या ठरावाची व्यवहार्यता तपासण्यासाठी तज्ञांशी चर्चा केल्यानंतर एका दिवसाने त्यांनी हा निर्णय घेतला. विरोधी पक्षांनी शुक्रवारी सात पक्षांच्या 71 खासदारांच्या स्वाक्षऱ्या सादर केल्या होत्या. परंतु यातील सात खासदार आधीच निवृत्त झालेले असल्याचे आढळून आले.
"विरोधी पक्षांच्या नोटिसीवर सात पक्षांच्या 71 खासदारांच्या स्वाक्षऱ्या होत्या. यांपैकी सात खासदार निवृत्त झाले आहेत, परंतु स्वाक्षऱ्यांची संख्या ही आवश्यक असलेल्या 50 स्वाक्षऱ्यांपेक्षा जास्त आहेत," असे काँग्रेसने पत्रकार परिषदेत सांगितले. परंतु हा लंगडा बचाव होता.
नायडू यांनी लोकसभेचे माजी सरचिटणीस सुभाष कश्यप, माजी विधि सचिव पी. के. मल्होत्रा, माजी विधिमंडळ सचिव संजय सिंह आणि राज्यसभा सचिवालयाच्या वरिष्ठ अधिकाऱ्यांशी चर्चा केली.
" मुख्य न्यायाधीशांच्या वर्तनाची चर्चा माध्यमांमध्ये करण्याची (विरोधी) सदस्यांची कृती ही औचित्य आणि संसदीय संकेतांच्या विरुद्ध आहे कारण त्यामुळे सरन्यायाधीश या संस्थेची अवमानना होते," असे नायडू यांनी एका निवेदनात म्हटले.
राज्यघटनेनुसार सरन्यायाधीशांविरुद्ध केवळ सिद्ध झालेले गैलवर्तन किंवा अक्षमता या दोन कारणांनी महाभियोग चालवता येऊ शकतो. विरोधकांनी पाच कारणे दाखवली आहेत आणि ते गैरवर्तन आहेत, असे काँग्रेसचे म्हणणे आहे.





सर्व कायदेशीर तज्ज्ञांनी विरोधकांच्या या मोहिमेवर टीका केली आहे. सर्वोच्च न्यायालयाचे माजी माजी न्यायमूर्ती सुदर्शन रेड्डी यांनी ही आत्मघातकी कृती असल्याचे म्हटले आहे, तर माजी महाधिवक्ते सोली सोराबजी यांनी ती दुर्दैवी असल्याचे म्हटले आहे. आता प्रश्न असा आहे, की हा सेल्फ गोल करण्यावर काँग्रेस इतकी ठाम का आहे?
हे प्रकरण येथे थांबणारे नाही. काँग्रेसची नजर लागली आहे ती 2019 च्या सार्वत्रिक निवडणुकांवर आणि देशात भारतीय जनता पक्षाच्या विरोधात वातावरण असल्याचा तिचा समज आहे. त्यामुळे या संपूर्ण प्रकरणातून मिळता येईल तेवढा फायदा घेण्याचा काँग्रेसचा प्रयत्न आहे. म्हणूनच असंतोष आणि अविश्वासाला जास्तीत जास्त खतपाणी घालण्याचा तिचा प्रयत्न आहे. विद्यमान सरन्यायाधीशांविरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव येण्याची ही पहिलीच वेळ आहे. त्यामुळे त्याचे काय गंभीर परिणाम होतील, याचा विचार तिला करावा लागेल. पण तो तिने केलेला नाही यातून ती किती घायकुतीला आली आहे, हे कळते.
आपला पराभव मान्य करून अधिक जिद्दीने लढा देण्यासाठी काँग्रेसने तयार व्हावे, ही वेळ आता आली आहे. गुजरातमधील निवडणुकीत तिने अत्यंत जोरदार प्रचार मोहीम चालवली. त्यामुळे तिला काहीसा आधार आणि धुगधुगी मिळाली, परंतु ती पुन्हा राहुल गांधीवादी मार्गावर चालू लागली आहे. एकानंतर एक घोडचुका करत आहे. नक्की सांगता येत नाही, परंतु केंब्रिज अॅनालिटिकाचे बिंग फुटल्याचाही हा परिणाम असू शकतो. ते काहीही असो, आपल्या दीर्घकाळच्या राजवटीत तिनेच रूढ केलेल्या क्लृप्त्या तिला पुन्हा शिकाव्या लागतील. पण त्यासाठी तिला नेतृत्वात बदल करावे लागतील, घराण्याचे जोखड फेकावे लागेल आणि ते तर काँग्रेसजनांसाठी 'अब्रह्मण्यम्'!
एकुणात, सध्या काँग्रेसचा एकमेव इलाज म्हणजे पराभव स्वीकारायला शिकणे!

Congress Should Learn to Accept Defeat


Congress as a party has an unparalleled stature and influence on the nation’s politics. It has the largest presence and influence in the every nook and corner of the country.  This influence and presence has receded to unprecedented level; that is a fact. However,  the fact remains that it has a potential to spring back to an honorable position, an appreciable position - even if does not match its glorious days.


On this backdrop, its humiliating theatrics become all the more pitiable. It points to its defeatist mentality showing  that it has lost willingness to fight its political battles in the political or electoral arenas and instead choosing to take shortcuts of maligning constitutional institutions. The slugfest that it has indulged itself  against the Chief Justice of India Dipak Mishra is a grim example of how low it has fallen.


Vice President of India and Rajya Sabha Chairman M. Venkaiah Naidu today rejected the notice given by opposition parties for impeachment of CJI Mishra citing lack of substantial. Seven opposition parties led had last week moved a notice before him for impeachment of the Chief Justice of India (CJI) on five grounds of "misbehaviour".  And Congress is leading this pack of the opposition parties. The impeachment notice came a day after the Supreme Court rejected a bunch of petitions seeking an independent probe into the death of Judge B. H. Loya, who was hearing the Sohrabuddin Sheikh encounter case.




Naidu held extensive consultations with top legal and constitutional experts before taking the decision. The rejection of the notice comes a day after he held the consultations with experts to determine the maintainability of the motion. The opposition had submitted signatures of 71 lawmakers from seven parties on Friday. However, seven MPs of these signatories were found to be already retired. “The opposition notice had signatures of 71 lawmakers from seven parties. Seven of the lawmakers have retired since, but the number of signatures was well above the mandatory 50,” the Congress said in a press conference.


Naidu spoke to former Lok Sabha Secretary General, Subhash Kashyap, former Law Secretary PK Malhotra, former Legislative Secretary Sanjay Singh and senior officials of Rajya Sabha Secretariat over the issue.


"This act of members (opposition) of discussing the conduct of the CJI in the press is against propriety and parliamentary decorum as it denigrates the institution of CJI," Naidu said in a statement . According to the constitution, Chief Justice Of India can be impeached only on grounds of proved misbehavior or incapacity. The opposition has backed its demand on five grounds, which, the Congress said, equals misbehavior.


All legal Experts have slammed the move. Former SC judge Sudarshan Reddy has termed this as a suicide move while former Solicitor General Soli Sorabjee has called it an unfortunate move. So the question is why Congress was Adamant on making this self goal?


The matter will not end here. With its eyes fixed on general elections in 2019 and an apparent atmosphere of discontent against BJP, Congress wants to harvest maximum yield from this entire episode and it is cultivating discontent and disbelief for the same reason. This is the first time ever that an impeachment notice has been filed against a sitting CJI. Therefore, it must understand the grave implications of its moves. That it did not shows its desperation.


The time has come for Congress to come to terms with defeat and prepare itself to fight with a determined spirit. It ran a brilliant campaign during Gujarat elections that gave it some mileage and breathers, but thereafter it is yet again on the Rahul Gandhian path, making one after another blunders. One doesn’t know but perhaps this has something to do with busting of Cambridge Analytica scandal. Whatever it may be, it has to learn the tricks of the rope that originally had brought to the board during its long regime. But for that, it has to go for a change in leadership, shedding the yoke of dynasty and that an anathema for it.


So all in all, the only remedy for it right now is to accept defeat.

Saturday, April 21, 2018

जज लोया मृत्यू - झूठों का मुंह काला


न्या. लोया की मृत्यू के मामले में, जो अपने आप में साफ था, खुद उच्चतम न्यायालय ने सफाई दी है। अपना राजनीतिक अजेंडा चलाने के लिए जो लोग न्यायालय का उपयोग करना चाहते हैं उनके लिए इससे बड़ा तमाचा और नहीं हो सकता। न्या. बी. एच. लोया की मौत के के पीछे कोई भी गुत्थी नहीं थी और वह तू पूरी तरह से प्राकृतिक कारणों से हुई थी, यह न्यायालय ने बिना लाग लपेट के बता दिया।इतना ही नहीं इस पूरे मामले के पीछे कोई छुपा हुआ अजेंडा होने का का निरीक्षण भी दर्ज किया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्या. खानविलकर और डी. वाई. चंद्रचूड की तीन सदस्यीय पीठ ने अपना फैसला साफ शब्दों में सुनाया है। हालांकि इससे सूचना युद्ध के सैनिकों पर कोई असर होने की गुंजाईश नहीं है।
देश की सभी यंत्रणाओं को लेकर संदेह पैदा करना, गलतफहमियां फैलाना और षड़यंत्र सिद्धांत प्रसारित करने का उनका काम बेखटके चलता रहगा। इस वर्ष के जनवरी महीने में मुख्य न्यायधीश के विरोध में पत्रकार वार्ता कर संदेह का माहैल खड़ा करनेवालों को भी उन्होंने जबरदस्त जमाल गोटा पिलाया है।
न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं के वकील दुष्यंत दवे, इंदिरा जयसिंग और प्रशांत भूषण को भी अच्छी खासी सुनाई है - सुस्पष्ट और निष्पक्ष! अर्थात् आधी रात के बाद न्यायालय के दरवाजे खोल कर साबित आतंकवादी को बचाने का नाट्य उसमें नहीं है, इसलिए उन्हें यह फैसला शायद रास ना आए। उस आशय की प्रतिक्रियाएं भी उनकी तरफ से आई है। संस्थात्मक औचित्य की (सिविलिटी) की साख न रखना और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के विरोध में बेतरतीब आरोप करना, इसके लिए इन तीनों को न्यायालय ने खरी खोटी सुनाई है।
राजनैतिक, व्यक्तिगत और व्यापारी हित संबंधों के लिए जनहित याचिका (पीआइएल) का दुरुपयोग करने को लेकर भी पीठ ने उपदेश सुनाया है। इतना ही नहीं, सीधे-सीधे छूटे और पक्षपाती सामग्री प्रकाशित करनेवाले आंदोलनकारी माध्यमों पर भी न्यायालय ने कटाक्ष किया है। न्याय संस्था को कलंकित करने और न्यायतंत्र को गुमराह करने की यह कोशिश है, यह भी न्यायालय ने ही बता दिया है।
न्या. लोया का निधन दिसंबर 2014 में हार्ट अटैक के कारण हुआ था। नागपुर में अपने एक सहयोगी की बेटी की शादी के लिए कुछ सहयोगियों के साथ वे गए थे। सोहराबुद्दीन शेख के झूटे एन्काउंटर मामले की सुनवाई न्या. लोया के समक्ष चल रही थी।
इस मामले में एक आरोपी थे अमित शाह जो समय भाजपा के अध्यक्ष है। आज की घड़ी में नरेंद्र मोदी के बाद यदि कोई लिबरलों की आंख में खटकता है तो वह अमित शाह है!
निरंजन टकले नामक एक पेशेवर झूठी सामग्री लिखनेवाले पत्रकार ने उतनी ही बराबरी के कैरावान नामक पत्रिका में एक लेख प्रकाशित किया। न्या. लोया की मृत्यू संदेहजनक स्थिति में हुई। आरोपी को छुड़ाने के लिए उन्हें 100 करोड़ रुपयों की ओफर दी गई लेकिन उन्होंने उसे नकार दिया और इसलिए उनका अप्राकृतिक निधन हुआ, इस आशय की सामग्री उसमें थी। यह लेखन काफी हद तक सेमी फिक्शन के माफिक था। टकले की ख्याति ऐसी, कि उनके द्वारा प्रकाशित समाचार (जैसे सावरकर द्वारा माफी मांगना) और शेअर की हुई सामग्री (जैसे कल्पना इनामदार का गोपाल गोडसे की नातिन होना) झूठी साबित हुई है। इस पर प्रश्न पूछनेवाले को वे विकृत और पागल कह सकते हैं इतना लिबरल अधिकार उन्हें है।
कैरावान में प्रकाशित वह लेख वह सीधे-सीधे राजनैतिक अभिनिवेश से लिखा गया था। इसलिए भाजपा-विरोधी मीडिया ने उसे सिर-आंखों पर बिठाया। कांग्रेस पार्टी ने तो उसकी वकालत की ही, राहुल गांधी ने लोया की मृत्यू में भाजपा अध्यक्ष का हाथ होने का संकेत कई बार दिया। इस प्रकरण में उन्होंने पत्रकार वार्ता की थी और 150 सांसदो को साथ में लेकर वे राष्ट्रपति के पास भी पहुंचे थे।
अर्थात् इसमें इस प्रकरण में असल में ही कोई दम नहीं था इसलिए उस का प्रतिफल कुछ होने की संभावना भी नहीं थी। इंडियन एक्सप्रेस जैसे सीधे तौर पर सरकार विरोधी अखबार ने भी कैरावान के लेख को तार-तार कर दिया था। लेकिन न्यूज़ के नाम पर सोशल मीडिया पर ठिकरा फोड़नेवाले किसी भी कलमबाज़ ने इस सफेद झूठ को लेकर एक अक्षर भी नहीं निकाला। जो निकाला वह मोदी-शाह को तोप के मुंह में देने के लिए ही।

लेकिन इस मामले में शायद ऐसा कुछ हुआ जिसकी लिबरल गैंग के को उम्मीद नहीं थी। खुद न्यायाधीश और न्यायालय को ही मुलजिम के कटघरे में खड़ा करने के कारण उच्चतम न्यायालय ने तुरत-फुरत उसकी दखल ली और केवल तीन महीनों में इसकी सुनवाई पूरी की।
अर्थात् न्यायालय सत्य को उजागर करें यह लिबरलों का उद्देश था ही नहीं। जहां आग है वह धुआं है, यह आम मनुष्य की प्रवृत्ति है। इसलिए चाहे जिस तरह से हो इन्हें धुआं खड़ा करना है ताकि आग-आग के ललकारें वे लगा सकें। शायद ऐसा निर्णय आने का उन्हें अंदेशा था इसीलिए जनवरी महीने में न्याय तंत्र के ही कुछ लोगों ने विद्रोह का दृश्य मंचित किया था। अब दूध और पानी अलग होने के बावजूद दूध में पानी होने का संदेह कायम रहेगा।
न्यायाधीश पर ही गुर्रानेवाले वरिष्ठ वकील, सुपारी लेकर सामग्री प्रकाशित और प्रसारित करनेवाली मीडिया और पूरी तरह परावलंबी बुद्धि के गैर-जिम्मेदाराना राजनेताओं से न्यायतंत्र और देश को बचाने की जरूरत है।
लिबरलों का पसंदीदा वाक्य प्रयोग करें तो - "पहले कभी नहीं इतनी जरूरत है"!

Friday, April 20, 2018

लोया मृत्यू प्रकरण - खोट्याच्या कपाळी गोटा


न्यायमूर्ती लोया यांच्या मृत्यूच्या मुळातच संशयातीत असलेल्या प्रकरणात सर्वोच्च न्यायालयानेच निर्वाळा दिला आहे. स्वतःचा राजकीय कार्यक्रम चालविण्यासाठी जे लोक न्यायालयाचा वापर करू इच्छितात त्यांच्यासाठी यापेक्षा अधिक जबरदस्त चपराक असू शकत नाही. न्यायमूर्ती बी. एच. लोया यांच्या निधनामागे कोणतेही गूढ नव्हते आणि हा संपूर्णपणे नैसर्गिक कारणांमुळे झालेला मृत्यू होता, असे न्यायालयाने कोणताही आडपडदा न ठेवता सांगितले. इतकेच नव्हे, तर या याचिकेमागे एखादा छुपा हेतू असल्याचेही निरीक्षण नोंदविले. भारताचे मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ती ए. एम. खानविलकर आणि डी. वाय. चंद्रचूड यांच्या तीन सदस्यीय खंडपीठाने आपला फैसला स्वच्छ शब्दांत सुनावला. अर्थात माहितीयुद्धाच्या शिपायांना यामुळे फरक पडणार नाही. देशातील सर्व यंत्रणांबद्दल संशय निर्माण करणे, गैरसमज आणि कट-सिद्धांत (कन्स्पायरसी थेअरीज) पसरविणे ही त्यांची कामे सुखेनैव चालू राहणार आहेत. या वर्षीच्या जानेवारी महिन्यात मुख्य न्यायाधीशांच्या विरोधात पत्रकार परिषद घेऊन संशयाचे धुके निर्माण करणाऱ्या न्यायालयीन मुखंडांनाही त्यांनी परस्पर जमालगोटा दिला आहे.


न्या. चंद्रचूड यांनी संपूर्ण खंडपीठाच्या वतीने हा निकाल दिला आहे. यात याचिकाकर्त्यांचे वकील दुष्यंत दवे, इंदिरा जयसिंग आणि प्रशांत भूषण यांनाही खडे बोल सुनावले आहेत - सुस्पष्ट व निष्पक्षपणे. अर्थात मध्यरात्रीनंतर न्यायालयाचे दरवाजे उघडून सुसिद्ध दहशतवाद्याला वाचविण्याचे नाट्य त्यात नसल्यामुळे त्यांना हा निकाल अळणी वाटणारच. तशा प्रतिक्रिया त्यांच्याकडून आल्याही आहेत. संस्थात्मक औचित्याची (सिव्हिलिटी) बून न राखणे आणि सर्वोच्च न्यायालयाच्या न्यायाधीशांविरूद्ध बेछूट आरोप कऱणे, याबद्दल या तिघांचीही कानउघाडणी न्यायालयाने केली आहे.


राजकीय, वैयक्तिक आणि व्यापारी हितसंबंधांसाठी सार्वजनिक हित याचिकांचा (पीआयएल) गैरवापर करण्याबद्दल खंडपीठाने चार उपदेशाचे बोलही सुनावले आहेत. इतकेच कशाला, सरळसरळ खोटा आणि पक्षपाती मजकूर प्रसिद्ध करणाऱ्या चळवळ्या माध्यमांवरही न्यायालयाने ताशेरे ओढले आहेत. न्यायसंस्थेला कलंकित करण्याचा आणि न्यायव्यवस्थेची दिशाभूल करण्याचा प्रयत्न करण्यात आल्याचेही खंडपीठाने म्हटले आहे.


न्या. लोया यांचे डिसेंबर 2014 मध्ये हृदयविकाराच्या झटक्याने निधन झाले होते. नागपूरच्या एका सहकाऱ्याच्या मुलीच्या लग्नासाठी ते काही न्यायाधीशांसोबत गेले होते. सोहराबुद्दीन शेख बनावट चकमक प्रकरणाची सुनावणी सीबीआय न्यायालयाकडे होती आणि ती सुनावणी न्या. लोयांसमोर चालू होती. या खटल्यातील एक आरोपी होते अमित शाह आणि ते सध्या भाजपाचे अध्यक्ष आहेत. आजच्या घडीला नरेंद्र मोदी यांच्याखालोखाल लिबरलांना जर कोणी खटकत असेल तर ते अमित शाह.


निरंजन टकले नावाच्या एका सराईत बनावट मजकूरबाजाने तितक्याच तोलामोलाच्या कॅराव्हान नावाच्या मासिकात एक लेख प्रकाशित केला. न्या. लोया यांचा मृत्यू संशयास्पद स्थितीत झाला. आरोपीला सोडविण्यासाठी त्यांना 100 कोटी रुपयांची ऑफर देण्यात आली पण त्यांनी तिला नकार दिला आणि त्यामुळे त्यांचा अनैसर्गिक मृत्यू झाला, अशा आशयाचा मजकूर त्यात होता. यातील लेखन हे बऱ्यापैकी सेमी-फिक्शन (अर्धकाल्पनिक) म्हणावे असे होते. टकले यांची ख्याती अशी, की त्यांनी प्रकाशित केलेल्या बातम्या (सावरकरांची माफी) किंवा शेअर केलेले साहित्य (कल्पना इनामदार या गोपाळ गोडसेंची नात असणे) या खोट्या निघाल्या आहेत. त्यावर प्रश्न विचारणाऱ्या लोकांना ते विकृत आणि वेडा म्हणू शकतात. एवढा लिबरल अधिकार त्यांच्याकडे आहे.
कॅराव्हानमधील तो लेख उघड उघड राजकीय अभिनिवेशाने लिहिला होता. त्यामुळे भाजपविरोधी माध्यमांनी त्याला डोक्यावर घेऊन नाचणे स्वाभाविकच होते. कॉंग्रेस पक्षाने तर त्याची भलामण केलीच; राहुल गांधींनी लोया यांच्या मृत्यूमागे भाजप अध्यक्षांचा हात असल्याचे अनेकदा सुचविले. या प्रकरणी पत्रकार परिषद घेतली होती. दीडशे खासदारांना सोबत घेऊन राष्ट्रपतींकडे गेले होते.


अर्थात यात आडातच काही पाणी नव्हते, त्यामुळे पोहऱ्यात काही असण्याचाही संभव नव्हता. इंडियन एक्स्प्रेससारख्या स्वच्छपणे सरकारविरोधी असणाऱ्या वृत्तपत्रानेही कॅराव्हानमधील लेखाच्या चिंधड्या उडविल्या होत्या. परंतु फेक न्यूजच्या नावाने सोशल मीडियावर आगपाखड करणाऱ्या एकाही लेखणीपुंगवाने एका पत्रकाराने केलेल्या या धडधडीत सत्यालापाबद्दल अवाक्षरही काढले नाही. असलेच, तर ते मोदी-शहा जोडगोळीला तोफेच्या तोंडी देण्यासाठीच!



पण लिबरल गँगला अनपेक्षित असे काही या प्रकरणात घडले असावे. खुद्द न्यायाधीश आणि न्यायालयालाच आरोपीच्या पिंजऱ्यात उभे केल्यामुळे सर्वोच्च न्यायालयाने त्याची तातडीने दखल घेतली आणि केवळ तीन महिन्यांत त्याची सुनावणी पूर्ण केली.


अर्थात न्यायालयाने सत्य समोर आणावे, हा लिबरलांचा मुळी उद्देशच नव्हता. एरवी त्यांच्या मुलाने खुलासा केल्यानंतरच हे प्रकरण थांबायला हरकत नव्हती. आगीशिवाय धूर असू शकत नाही, ही सर्वसामान्य मानवी वृत्ती आहे. त्यामुळे कुठल्याही मार्गाने का होईना धुराळा निर्माण करायचा आणि धूर-धूर म्हणून आगीचा आभास निर्माण करायचा, हा त्यांचा उद्देश आहे. हे असे निर्णय येण्याची अपेक्षा असल्यामुळेच असावे कदाचित परंतु जानेवारी महिन्यात न्यायव्यवस्थेतील काही जणांनी बंडाचा देखावा उभा करून तिथेही संशय निर्माण केला. आता दूध आणि पाणी वेगळे झाले तरी दुधात पाणी असल्याची शंका कायम राहणारच.
न्यायाधीशांवरच गुरकावणारे ज्येष्ठ वकील, सुपारी मजकूर छापणारे माध्यम आणि सर्वस्वी परभृत बुद्धीचे बेजबाबदार राजकारणी - न्यायव्यवस्थेला आणि देशाला त्यांच्यापासून वाचविण्याची गरज आहे. लिबरलांचे आवडते वाक्य वापरायचे तर 'कधी नव्हे एवढी गरज आहे.'