Friday, March 9, 2018

आखिर चंद्राबाबू की मंशा क्या है?

narendra modi Chandrababu Naiduसरकार से निकलते हुए भी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में बने रहने की घोषणा करते हुए आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्राबाबू नायडू ने कहानी में ट्वीस्ट लाया है। भारतीय जनता पार्टी की एक दिशा में बढ़ती हुई यात्रा में उन्होंने एक मोड़ लाया है।


यह सर्वविदीत है, कि पिछले कई दिनों से भाजपा और तेलुगू देशम के बीच रिश्तों में खटास आई थी। एनडीए से बाहर निकलने की चंद्राबाबू गाहे-बगाहे कई बार घोषणा कर चुके थे। जनवरी में उन्होंने कहा था, ‘गठबंधन धर्म के कारण हम चुप हैं। यदि वे हमें नहीं चाहते तो हम नमस्कारम कह देंगे और अपनी राह पर निकल पड़ेंगे।’लेकिन उस पर पहल अभी तक नहीं हुई थी। बुधवार की रात 10 बजे के बाद उस पर अधिकारिक मुहर भी लग गई।


“मैंने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से 29 बार मुलाकात की लेकिन उन्होंने ध्यान नहीं दिया। जिस तरह से वे बात कर रहे हैं और कह रहे है, कि ‘हम इतना ही दे सकते है’ वह राज्य का अपमान है,” नायडू ने ताजा संवाददाता सम्मेलन में कहा।


हालांकि यह एक रटरटाया बयान है जिसका अभ्यास उनकी पार्टी वर्षों से कर रही है। तेलुगू आत्म-सम्मान का नारा तेदेपा के लिए एक सुपरीक्षित अस्त्र है जिसका प्रयोग कई बार किया गया है और वह भी सफलता के साथ। आखिर वह दिल्ली द्वारा आंध्र का अपमान किए जाने की दुहाई ही तो थी, जिसे देकर एन. टी. रामाराव हैद्राबाद की सत्ता पर आसीन हुए थे। इसी आघोष के साथ उन्होंने तेदेपा को जन्म दिया और सत्ता भी प्राप्त की। आज उसी जुमले को उछालकर चंद्राबाबू ने 1982-83 के चरित्र को दुहराने की कोशिश की है। फर्क इतना है, कि तब सत्ता में कांग्रेस थी और आज भाजपा है।


आंध्र प्रदेश और केंद्र के बीच विवाद का केवल एक कारण है और वह है एक शब्द : विशेष। इसका कारण है, कि आंध्र प्रदेश का विभाजन कर तेलंगाना बनाते समय लोकसभा में बहस के दौरान तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने घोषणा की थी, कि नए आंध्र को वित्तीय समस्या के उबरने के लिए विशेष श्रेणी का दर्जा (एससीएस) दिया जाएगा। मनमोहन सिंह ने यह घोषणा 5 वर्षों के लिए की थी, जबकि भाजपा ने सत्ता पाने की जद्दोजहद में 2014 में यह विशेष दर्जा एक दशक तक देने का वादा किया था। भाजपा के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने वाले तेलुगु देसम के लिए इससे ज्यादा खुशी की बात क्या हो सकती थी?


मगर आंध्र प्रदेश को विशिष्ट राज्य का दर्जा देने में मोदी मदद करेंगे, इसकी उम्मीद लगाए बैठे चंद्राबाबू के हाथ निराशा ही लगी थी। दोनों दलों के बीच अंतर इतना बढ़ गया, कि आखिर नायडू ने कहा, कि वे अपमानित महसूस कर रहे है।


आज एससीएस की स्थिति यह है, कि राजकीय क्षितिज पर उसकी दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है। भाजपा ने आंध्र को विशेष राज्य तो दूर, आम राज्यों की कतार में एक और राज्य से अधिक कुछ नहीं बनाया है। इसके लिए केंद्र ने 14 वें वित्त आयोग की सिफारिश को ढाल बनाया है जिसने एससीएस के खिलाफ सिफारिश की है। इसलिए विशेष वर्ग के नाम को छोड़कर उसके तहत मिलनेवाले सभी वित्तीय लाभ देने की बात केंद्र ने की है। इसका मतलब यह है, कि केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं का 90 प्रतिशत केंद्र द्वारा दिया जाएगा और राज्य द्वारा 10 प्रतिशत। आम तौर पर कुछ परियोजनाओं के खर्च का 60 प्रतिशत हिस्सा केंद्र द्वारा और 40 प्रतिशत राज्य द्वारा दिया जाता है।


केंद्र की इस पेशकश को चंद्राबाबू ने हामी भरी थी, क्योंकि इसके अलावा उनके पास कोई चारा भी नहीं था। वास्तविकता यह है, कि चंद्राबाबू मोदी से ऐसा कुछ उगलवा नहीं पा रहे थे जैसा 1998-2004 के दौरान वे अटलबिहारी वाजपेयी से उगलवाते थे।


अब सवाल यह है, कि क्या तेदेपा का सरकार से बाहर निकलने से आंध्र का कुछ भला होगा? इसका उत्तर है, नहीं। खासकर तब अगर भाजपा 2019 में सत्ता में लौट आ जाए। दूसरी तरफ भाजपा और वाईएसआर कांग्रेस नेता जगनमोहन रेड्डी के बीच भी नजदीकियां बढ़ रही है। इसके कारण भी तेदेपा की भौंहें तन गई है। जगनमोहन रेड्डी की पिछले दिनों भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात ने इस बात को बल ही दिया है। जगनमोहन ने पहले भी कहा था और अब भी कहते है, कि अगर भाजपा आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा देती है तो वो उसका समर्थन करेंगे। इसी बीच केंद्रीय जांच एजेंसियों के कई केस जगन पर चल रहे हैं। इन पचड़ों से खुद को बचाए रखने के लिए जगन भाजपा से हाथ मिलान चाहते हैं।


इसलिए भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलकर चंद्राबाबू शहीद बनना चाहते है। यह चंद्राबाबू का एक हथकंडा है जो एक तरह से भाजपा के खिलाफ नूरा कुश्ती है। राज्य में अपनी साख बचाने के लिए खेली गई यह चाल है। भाजपा को खलनायक बनाकर वे नायक बनना चाहते है जिससे आंध्र की सत्ता में उनका पुनरागमन सुकर हो। ऐसा हुआ, तो भाजपा और तेदेपा फिर से एक थाली में खाते हुए दिख सकते है।

Wednesday, March 7, 2018

लेनिन लगता कौन है आपका? बाप? दोस्त या मालिक?

यूरोपीय संसद की सदस्या सँड्रा कैल्निएट (Sandra Kalniete) की एक पुस्तक है साँग टू किल ए जायंट। इस पुस्तक में सँड्रा ने तत्कालीन सोवियत शासन के खिलाफ उनके देश लाटविया के स्वतंत्रता आंदोलन का वर्णन किया है। इस पूरी पुस्तक में भारत (इंडिया) का एक उल्लेख केवल एक बार आया है जब दमनकारी शासन के विरोध में एक युवा विद्रोही कार्यकर्ता के तौर पर सँड्रा को सज़ा के तौर पर वहां भेजा जाता है। उस समय के सोवियत दूतावास का वर्णन सँड्रा ने कुछ इस तरह किया है, “वहां का माजरा देखकर मैं हैरान रह गई। वहां हर सोवियत अधिकारी स्थानीय लोगों के साथ ऐसे बर्ताव कर रहा था जैसे वह मालिक हो और स्थानीय लोग गुलाम। मेरे लिए यह एक सांस्कृतिक सदमा था।”


यह उस लेखिका ने लिखा है जो एक शोषणकारी और अत्याचारी शासन के खिलाफ आंदोलन कर रही थी। उस शोषणकारी और अत्याचारी शासन में भी गुलामी का जो भाव उसे नहीं दिखा, वह उसे नई दिल्ली के सोवियत दूतावास में दिखा। यह प्रसंग बताने के लिए काफी है, कि तत्कालीन सोवियत शासकों का भारत के प्रति रवैय्या कैसा था।


इस वाकये का संस्मरण होने का कारण था व्लादिमिर लेनिन की मूर्ति का उखाडना। त्रिपुरा में भारतीय जनता पक्ष की विजय के बाद हवा बदलने लगी है। उसी के चलते दक्षिण त्रिपुरा जिले के बेलोनिया में कम्युनिस्ट नेता व्लादिमिर लेनिन की एक प्रतिमा जेसीबी मशीन का इस्तेमाल कर गिरा दी गई। कुछ ही महिनों पहले पहले पार्टी पोलित ब्यूरो सदस्य प्रकाश करात ने इस प्रतिमा का अनावरण किया था। इस घटना को लेकर मार्क्सवादी खेमे में बौखलाहट स्वाभाविक है, लेकिन समस्त लिबरल कैंप में इसको लेकर बेचैनी है। लेनिक के रूस ने किस तरह भारत की मदद की, लेनिन कितना महान आदी चीजों की दुहाई दी जा रही है। हालांकि यह स्पष्ट हो नहीं पा रहा है, कि ये लोग बेचैन किस बात से है – मूर्ति गिराने को लेकर या प्रतिमा को गिराये जाने के बाद भारत माता की जय के नारे भी लगाने को लेकर?


जिस त्रिपुरा में लेनिन और स्टालिन की जयंती मनाई जाती हो, लेकिन रबीन्द्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद और महाराजा वीर विक्रम देव की जयंती कभी नहीं मनाई जाती थी वहां भारत माता की जय के नारे लगना अपने आप में एक कयामत है। इससे लिबरलों के मन में कसमसाहट के गुबार उठना जायज ही नहीं, स्वाभाविक भी है। ये वही लोग है जो वीर सावरकर की काव्य पंक्तियां जब अंदमान के सेल्युलर जेल से हटाई गई तो खुशी से चहक उठे थे। ये वही लोग है जिनकी आंखे त्रिपुरा और केरल में मार्क्सवादी गुंड़ों के हाथों मारे गए लोगों के लिए आंसू बहाना हराम समझती है। इनके लिए 80 साल पहले मर चुके एक निर्दय हत्यारे की स्मृति अधिक महत्वपूर्ण है बनिस्बत उनके जो तुम्हारी-हमारी तरह जीते-जागते इन्सान है। हाल ही में केरल में एक 30 वर्षीय कांग्रेस कार्यकर्ता शोएब की हत्या की गई और उसके परिवारवालों का कहना है, कि माकपा के हत्यारों ने इसे अंजाम दिया है। लेकिन उनके लिए यह कोई विषय ही नहीं है।


आखिर लेनिन कौन था? भारतीयों से उसका संबंध क्या था?



सोवियत रूस में 72 वर्षों तक लेनिन की पूजा की गई, यहां तक की उसका शव भी नहीं दफनाया गया। मास्को में एक भव्य मकबरे में कांच के विशाल बक्से के भीतर लेनिन का शव आज भी सुरक्षित है। हर जगह उसकी मूर्तियां स्थापित की गई। लेकिन मार्क्सवाद या लेनिनवाद एक अप्राकृतिक कल्पना थी, जिसका ढहना तय था। धर्म को अफीम, अध्यात्म को अंधविश्वास और आस्था को मूर्खता कहनेवाले स्वघोषित विचारकों की पराकोटी की व्यक्ति पूजा नहीं तो और क्या है? लेनिन का शासनकाल था सन 1918 से 1924 तक. इसी को रेड टेरर (लाल आतंक) के रूप में जाना जाता है। सितंबर 1918 में याकॉव स्वेरडलोव द्वारा अधिकारिक रूप से इसकी घोषणा की गई थी। चेका (बोल्शेविक गुप्त पुलिस) ने लाल आतंक के दमन को अंजाम दिया था। इस दौरान लगभग 100,000 हत्याएं होने का अनुमान है जबकि मारे जानेवालों की कुल संख्या 200,000 मानी गई है।


सोवियत संघ के विघटन के बाद खुद रूसी लेखकों ने लेनिन के यौन पिपासु, विश्वासघाती और बर्बर अत्याचारों का जो कच्चा चिट्ठा खोला है। वह एक महान सेनानी, दूरदर्शी नेता और समानता का दूत कतई नज़र नहीं आता, जैसा कि हमारे वामपंथी उसे दिखाना चाहते है। रूसी रिकार्ड उसे वही बताते है जो वह था – निर्मम शासक, अत्याचारी और एक धूर्त राजनेता। यही तो वजह है, कि खुद रूस की नई पीढ़ी उसे अपनाना नहीं चाहती। सोवियत तंत्र के ढ़हने के बाद सबसे पहले किस चीज को ढहाया गया? अर्थात् लेनिन की मूर्ति को!


यह शर्म की बात है, कि जिस लेनिन को उसके अपने देशवासियों ने नकारा है उसी के भक्त हमारे यहां पैदा हो गए है। लेनिन-भक्ति रूस में मर गई लेकिन भारत में जिंदा है। क्या लेनिन इनका पिता है? कौन सी विचारधारा का पितृत्व लेनिन के पास जाता है? क्या लेनिन इनका दोस्त है? लेनिन के काल में दोस्ती की कौन सी मिसाल पेश हुई, यह भी तो बताएं। इस लिहाज से इनका पूरा खाता खाली है।


हां, यह हो सकता है, कि लेनिन इनका मालिक है। कम्युनिस्ट हमेशा पहले रूस और अब चीन के कदमताल पर चलने के लिए जाने जाते है। इनकी इसी रूसधर्मिता के कारण जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस स्वतंत्रता की लढ़ाई लढ़ रहे थे, तब कम्युनिस्ट पत्रिकाएं उन्हें टोजो (जापान के सेनानी) का कुत्ता कह रहे थे।


और यही कम्युनिस्ट (सेकुलर, लिबरल आदी सबको मिलाकर) जब भगतसिंग की दुहाई देकर लेनिन का महीमा मंडन करते है तो और आश्चर्य होता है। लेनिन के अत्याचारों का पुलिंदा तो काफी बाद में खुला, इसलिए भगतसिंग को उसकी जानकारी होने का सवाल ही नहीं। तत्कालीन परिप्रेक्ष्य में रूस की क्रांति से सभी क्रांतिकारी प्रभावित हुए थे, इसमें दो राय नहीं है। अगर भगतसिंग जिंदा रहते और उन्हें लेनिन (और स्टैलिन) की सच्चाई पता चलती तो वे भी उनसे मुंह मोडते। अपनी फांसी से पहले भगतसिंग ने शायद लेनिन की जीवनी पढ़ी भी हो, लेकिन क्या यह बात झूठी है, कि भगतसिंग को सज़ा जिस हत्या के लिए हुई थी, वह एक आर्य समाजी (लाला लजपत राय) का बदला लेने के लिए की गई थी।


भगतसिंग भारतीय थे, लिबरलों, जो तुम नहीं हो।

Tuesday, February 20, 2018

कुंपणानेच खाल्लेले शेत

बुडीत कर्ज आणि नॉन परफॉर्मिंग अॅसेट यामुळे आधीच बेजार झालेल्या बँकांना पीएनबीमधील घोटाळा म्हणजे दुष्काळात तेरावा ठरला आहे. पंजाब नॅशनल बँकेत झालेला हा घोटाळा तब्बल अकरा हजार 346 कोटींचा आहे. यात नक्की किती बँका गुंतल्या आहेत, याचा आकडा माहीत नसला तरी अन्य सहा बँकांना त्याचा फटका बसेल, असा अंदाज आहे. ही तर केवळ एक झलक आहे. रॉयटर्स वृत्तसंस्थेच्या एका वार्ताहराने माहिती अधिकारात मिळविलेल्या माहितीनुसार, देशातील किमान 30 बँकांमध्ये अशा प्रकारचे कर्ज फसवणुकीचे प्रकरण सुरू आहेत. यात एकूण गैरव्यवहाराची रक्कम 61 हजार कोटी रुपयांपेक्षा जास्त असल्याचा अंदाज आहे. देशातील 21 सरकारी बँकांकडून ही माहिती मागविण्यात आली होती. त्यातील 15 जणांनी उत्तर दिले. त्यानुसार 31 मार्च 2017 पर्यंतची ही 61 हजारांची रक्कम आहे.


एखाद्या राष्ट्रीयकृत बँकेला गैरव्यवहाराचा फटका बसण्याची ही काही पहिलीच वेळ नाही. आयआयएम बंगळुरुने केलेल्या सर्वेक्षणानुसार, 2012 ते 2016 या पाच वर्षांमध्ये राष्ट्रीयकृत बँकांना गैरव्यवहारांमुळे 22743 कोटी रुपयांचा फटका बसला आहे. अन् या सर्व प्रकरणांमध्ये बँक कर्मचाऱ्यांचा समावेश आहे. हे म्हणजे कुंपणानेच शेत खाण्याचा प्रकार आहे. हा सर्व प्रकार अत्यंत अस्वस्थ करणारा असून गैरव्यवहार होत असताना तब्बल सहा वर्षे कोणीही या गोष्टीची दखल घेतली नाही, ही खरी काळजीची बाब आहे. साध्या शालेय वर्गांमध्येही आपण मॉनिटर नेमतो आणि येथे लोकांचा कोट्यवधी अब्जावधी रुपयांचा पैसा असताना त्याच्यावर लक्ष ठेवणारे कोणीही नाही, हे अत्यंत क्लेशकारक आहे.


आधी सहा लाख 98 हजार कोटी रुपयांचे नॉन परफॉर्मिंग अॅसेट आणि त्यात आता हा अकराशे कोटी रुपयांचा घोटाळा. याचा अर्थ अगदी थोड्या कालावधीमध्येच लोकांनी मेहनतीने कमावलेल्या सात लाख कोटी रुपयांवर पाणी फिरणे असा आहे. जनतेचा निधी सांभाळायला ज्यांच्याकडे दिला होता त्यांनी केलेल्या या विश्वासघाताकडे आपण कसे पाहावे? ही बाब आपण सहजपणे घेऊ शकतो का?


काही बँक कर्मचाऱ्यांना अटक झाली हे आणि काही जणांना निलंबित केलेही असेल. त्यांच्याबरोबरीने या कृत्यांमध्ये सहभागी असलेल्या बाकीच्यांचे काय? बँकेत पैसे जमा केलेल्या एक लाख रुपयापर्यंतच्या ठेवींना विम्याचे संरक्षण असते. याचाच अर्थ त्यापेक्षा जास्त पैसे जर तुम्ही गमावले तर त्याला कोणीही जबाबदार नाही, ना सरकार ना रिझर्व बँक ऑफ इंडिया. त्यामुळे त्याची नुकसानभरपाई मिळण्याची आशा करणे व्यर्थ आहे.


हा एखाद्या अपवादात्मक घोटाळा आहे का? तर नाही. मुळातच ही संपूर्ण व्यवस्था सडलेली आहे. ही घटना अपवादात्मक नाही, हे तर उघडच आहे कारण निरव मोदींनी ज्या पद्धतीने हा घोटाळा केला ती पद्धत हर्षद मेहताने 1990 दशकांमध्ये वापरलेल्या पद्धतीसारखीच आहे. हर्षद मेहताने खोट्या बँका व त्यांचा वापर करून बँकांना 4999 कोटी रुपयांचा गंडा घातला होता, पण निरव मोदीने गैरमार्गाने लाईन ऑफ क्रेडिट वापरून पंजाब नॅशनल बँकेलागंडा घातला आहे. रिझर्व बँकेचे डेप्युटी गव्हर्नर एस. विश्वनाथन यांनी अलीकडेच बँकांमध्ये परिणामकारक जोखीम व्यवस्थापन यंत्रणा नसल्याबद्दल त्यांची कानउघाडणी केली होती. त्यांच्या या वक्तव्याला पीएनबी प्रकरणामुळे दुजोराच मिळाला आहे. रिझर्व बॅंकेचे देशातील सर्व बँकांवर नियंत्रण असते, असे म्हटले जाते. मग पीएनबीमधील जोखीम व्यवस्थापन यंत्रणेतील कमकुवत दुवे तिला कसे आढळले नाहीत?


जागतिक पातळीवरही बँक गैरव्यवहार हा एक मोठा उद्योग झालेला आहे. असोसिएशन ऑफ सर्टिफाईड फ्रॉड एक्झामाईनर्स नावाची एक संघटना आहे. या संघटनेच्या अहवालानुसार, 2015-26 या एका वर्षात बँक गैरव्यवहारामुळे 67 अब्ज डॉलरचा फटका बसला. अन् यापैकी बहुतेक प्रकरणांमध्ये कर्मचाऱ्यांचा हात होता. बँक कर्मचारी आणि व्यवस्थापन यांच्यामधील संगनमत ही बँक उद्योगातील सर्वसामान्य बाब आहे. देशात आर्थिक उदारीकरणानंतर बँकांचे आधुनिकीकरण करण्यास सुरूवात झाली होती. तेव्हा संगणकीकरणाला कडाडून विरोध बँक कर्मचाऱ्यांनीच केला होता. त्यानंतर बँकिंग क्षेत्रातील प्रत्येक सुधारणेला बँक कर्मचाऱ्यांनी विरोध केला आहे.


गेल्या वर्षीच्या ऑक्टोबर महिन्यातील गोष्ट. नागरिकांच्या बँक खात्याशी ‘आधार’ क्रमांक जोडण्याच्या सरकारच्या आदेशाच्या विरोधात मद्रास उच्च न्यायालयात याचिका दाखल करण्यात आली. ही याचिका कोणी केली होती? तर बँक अधिकाऱ्यांच्या संघटनेने! “बँक खाते तसेच अन्य व्यवहारांशी आधार क्रमांक जोडणे हे मानवाधिकाराचे उल्लंघन असून तसेच ते व्यक्तीच्या खासगीपणाच्या हक्काचेही उल्लंघन आहे. या संदर्भात सर्वोच्च न्यायालयानेही स्पष्ट निर्णय दिलेला आहे. मात्र त्या आदेशाचेही उल्लंघन करून ‘आधार’ची सक्ती करण्यात येत आहे. त्यामुळे संघटनेच्या वतीने त्या विरोधात न्यायालयात सार्वजनिक हिताची याचिका दाखल केली आहे,” असे अखिल बँक कर्मचारी संघटनेचे सरचिटणीस थॉमस फ्रँको यांनी तेव्हा सांगितले होते.


आधार काय किंवा अन्य पारदर्शकतेची मागणी काय, अशा प्रकारच्या प्रत्येक सुधारणेला विरोध करायचा, कुठलीही नवी योजना आली की खासगीकरणाची कोल्हेकुई करायची, जागतिकीकरणाच्या नावाने ठणाणा करायचा आणि बिनबोभाट आपली लूट चालू ठेवायची, हा यांचा खाका. हर्षद मेहता, विजय मल्ल्या, निरव मोदी, कोठारी इ. ही सर्व या ‘गुपचुप’ संस्कृतीला आलेली फळे आहेत. सरकार हे आहे का ते हा प्रश्नच अलाहिदा आहे.

Friday, February 16, 2018

कर्नाटकात काँग्रेसची डोकेदुखी वाढली

कर्नाटकातील निवडणूक युद्धाच्या रणभेरी आता वाजू लागली असून सर्व प्रमुख राजकीय पक्षांनी आपली कंबर कसली आहे. तशात धर्मनिरपेक्ष जनता दलाने बहुजन समाज पक्षाची युती करण्याचा निर्णय घेतल्यामुळे काँग्रेसची डोकेदुखी वाढली आहे.


धर्मनिरपेक्ष जनता दलाचे नेते व माजी पंतप्रधान एच. डी. देवेगौडा यांनी बसपशी युती करण्याचा निर्णय घेतला आहे. मायावती यांच्या नेतृत्वाखालील या पक्षाला 20 जागा सोडण्याचे त्यांनी जाहीरही केले आहे. तसेच तिसऱ्या आघाडीच्या नेत्यांना प्रचारासाठी बोलवण्याचेही त्यांनी जाहीर केले आहे. त्यामुळे काँग्रेसच्या गोटात चिंतेचे वातावरण आहे.



आताच्या घडीला काँग्रेसच्या ताब्यात जी राज्ये आहेत त्यात कर्नाटक हे सर्वात मोठे. त्यामुळेच तिथली सत्ता ताब्यात राहावी यासाठी काँग्रेस जंग जंग पछाडत आहे. लिंगायतांना स्वतंत्र धर्मासाठी उचकावण्यापासून राज्याचा स्वतंत्र झेंडा करण्यापर्यंत प्रत्येक प्रकारचा डाव काँग्रेसने खेळला आहे. पाच वर्षांपूर्वी काँग्रेसने कर्नाटकची सत्ता भाजपकडून खेचलेली आहे. त्यावेळी कर्नाटकात प्रचार करताना सोनिया गांधी म्हणाल्या होत्या, की आपली (काँग्रेसची) सत्ता 15 राज्यांमध्ये आहे. आज भाजपची सत्ता 19 राज्यांत आहे आणि काँग्रेस राजकीय पटावर चाचपडत आहे. त्यामुळे कर्नाटकचे महत्त्व काँग्रेसला अधिक आहे. सध्या कर्नाटक विधानसभेत 224 पैकी 127 जागा काँग्रेसकडे आहेत.


कर्नाटकातील सामन्यात काँग्रेसची बऱ्यापैकी भिस्त दलित मतांवर आहे. कर्नाटकात अल्पसंख्यक, दलित आणि मागासवर्गीयांना अहिंद या संक्षिप्त नावाने ओळखण्यात येते. या अहिंद गटाला खुश ठेवण्याचे मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या यांनी गेले काही महिने प्रयत्न सुरू ठेवले होते. मुख्यमंत्री म्हणून सादर केलेल्या आपल्या प्रत्येक अर्थसंकल्पात या समुदायावर सिद्धरामय्या यांनी विशेष लक्ष केंद्रित केले होते. मात्र जेडीएस आणि बसप यांच्यातील युती याच मतांवर डल्ला मारेल, असा काँग्रेस नेत्यांचा अंदाज आहे. भूतकाळात बसपचे विजयी झालेले सर्व नेते हे मुस्लिम आणि दलित समुदायातील होते, हे आणखी एक विशेष.


जेडीएस आणि बसपने हातमिळवणी करण्याची ही पहिलीच वेळ आहे. बसप नेत्या मायावती राज्यामध्ये अनेक सभा घेणार आहेत. यातील पहिली सभा 17 फेब्रुवारी रोजी बंगळूरमध्ये आहे. अर्थात कर्नाटकात कुठल्याही प्रकारची मोठी टक्कर देण्याची बसपची ताकद नाही, परंतु काँग्रेसची मते वळविण्याचे काम हा पक्ष नक्कीच करू शकतो.


बसपला कर्नाटकात आतापर्यंत म्हणावे तसे यश मिळालेले नाही. केवळ 1999 साली विधानसभेत पक्षाला एक जागा मिळाली होती. मात्र पक्षाच्या मतांमध्ये सातत्याने वाढ होत होत आहे. बसपला 2004 मध्ये 1.74 टक्के मते मिळाली होती, 2008 मध्ये ती वाढून 2.7 टक्के झाली होती. बसपच्या या वाढलेल्या टक्केवारीमुळे काँग्रेसची मते कमी होऊन काँग्रेसला या दोन्ही निवडणुकांमध्ये पराभवाचा सामना करावा लागला, असे विश्लेषण त्यावेळी तज्ञांनी केले होते. त्या वेळी काँग्रेसच्या अनेक उमेदवारांना अत्यंत कमी फरकाने पराभव पत्करावा लागला. पुढे 2013 साली बसपला एक टक्का मते मिळाली आणि नेमका काँग्रेसचा विजय झाला. त्यामुळे बसप व काँग्रेसच्या मतांमध्ये व्यस्त प्रमाण असल्याचे सर्वसाधारणपणे मानले जाते.


देवेगौडा हे तिसऱ्या आघाडीचे पंतप्रधान होते. त्या आघाडीचे कितीतरी शकले उडाली असली तरी त्यातील घटक पक्षांशी अजूनही गौडा यांचे चांगले संबंध आहेत. त्या सहकाऱ्यांना पुन्हा आपल्या सोबत आणण्याचे प्रयत्न गौडा यांनी सुरू केले आहेत. तुमकुरु येथे नुकतीच त्यांनी अल्पसंख्याक समाजाची सभा घेतली. या सभेला काश्मीरमध्ये नॅशनल कॉन्फरन्सचे नेते फारुख अब्दुल्ला उपस्थित होते त्याचप्रमाणे उत्तर प्रदेशातील समाजवादी पक्षाचे नेते मुलायमसिंह यादव यांना आणण्याची तयारी त्यांनी सुरू केली आहे. वरकडी म्हणजे जेडीएसने राष्ट्रवादी कॉंग्रेस पक्षाशी (एनसीपी) युतीची घोषणा करून टाकली आहे. शरद पवार यांच्याशी झालेल्या बैठकीनंतर खुद्द कुमारस्वामींनी त्याची घोषणा केली आहे.


इतकेच काय पण मार्क्सवादी आणि भारतीय कम्युनिस्ट पक्षांशी युती करण्याचे देवेगौडा यांचे प्रयत्न सुरू आहेत. अन् ही युती पुढे 2019 सालच्या लोकसभा निवडणुकीपर्यंत नेण्याचीही त्यांची योजना आहे. त्यामुळे आपल्या हक्काच्या मतात वाटेकरी येणार म्हणून काँग्रेसची चिंता आणखी वाढली आहे.


कर्नाटकची ही निवडणूक काँग्रेस आणि भाजप या दोन राष्ट्रीय पक्षातील लढत ठरेल असा तयार असून बहुतेक तज्ञांचे मत आहे की येथे विधानसभा त्रिशंकू असेल. त्यामुळे बसपचे आगमन हे काँग्रेसला मोठा फटका ठरू शकते.


राजकीयदृष्ट्या कर्नाटकाचे चार मुख्य भाग पडतात – हैद्राबाद-कर्नाटक (पूर्वीच्या निजामाच्या अधिपत्याखाली असलेला भाग उदा. गुलबर्गा, रायचूर, बीदर इ.), मुंबई- कर्नाटक (मराठीभाषक कर्नाटक उदा. धारवाड, बेळगाव, विजापूर, निपाणी, कारवार इ.), म्हैसूर राज्यातील मुख्य कर्नाटकातील प्रदेश आणि करावळी (किनारपट्टीचा प्रदेश उदा. मंगळूर, उडुपी, भटकळ इ.). यातील करावळीतील बहुतांश भाग भाजपच्या प्रभावाखालील भाग आहे, तर जेडीएसचा प्रभाव मुख्यतः म्हैसूर भागात आहे. अन् म्हैसूर हाच मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या यांचा मतदारसंघ आहे. जेडीएस आणि बसपची युती ही हैद्राबाद- कर्नाटक विभागातील कॉंग्रेसच्या मतांना खिंडार पाडू शकते.या भागात अल्पसंख्याकांची मते मोठ्या प्रमाणात आहेत आणि काँग्रेसचे दीर्घकाळापासून या क्षेत्रावर वर्चस्व राहिले आहे. काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी यांनी आपला पहिला दौरा हैद्राबाद-कर्नाटक क्षेत्रातील रायचूर येथेच केला होता, हे येथे उल्लेखनीय.


आता घोडामैदान अगदी जवळ आले आहे. येत्या एका महिन्याच्या शह-प्रतिशहानंतर विधानसौधावर कोणाचा झेंडा फडकेल, हे कळेल. मात्र सध्याच्या सोंगट्या तरी काँग्रेसला प्रतिकूलच चालत आहेत, हे नक्की.

Thursday, February 8, 2018

लिलिपुटांच्या गराड्यातील सिंदबाद

पंतप्रधान नरेंद्र मोदी यांनी लोकसभा आणि राज्यसभेत केलेल्या भाषणाच्या वेळेस ज्या प्रकारचे वातावरण होते, त्यावरून लोकशाहीच्या नावाने गळे काढणाऱ्यांची तोंडे आपसूकच बंद व्हायला हवी. एखादा पंतप्रधान राष्ट्रपतीच्या अभिभाषणावरील धन्यवाद प्रस्तावाला उत्तर देताना बोलत असेल तेव्हा विरोधकांनी गदारोळ करावा, हे दृश्य तसे दुर्मिळच. पण काल हेच घडले आणि तेही संसदेच्या दोन्ही सभागृहांत.काहीही करा, पण सभागृह चालू देऊच नका असा जणू या खासदारांना त्यांच्या धुरिणांनी आदेशच दिला असावा. म्हणायला ती संसदेची सभागृहे होती, पण तेथील एकूण प्रकार कुठल्याही प्रकारे संसदीय नव्हता. सत्ताधाऱ्यांपेक्षा विरोधकांनाच पुढल्या निवडणुकीची चिंता लागल्याचे ते लक्षण होते.


दुसरीकडे मोदींनी ज्या प्रकारे विरोधकांवर, खासकरून काँग्रेसवर, हल्ला चढविला त्यातून हेही स्पष्ट झाले, की जशास तसे उत्तर देण्याची आजही त्यांच्याकडे धमक आहे. विरोधकांनी नको तिथे आक्रमक होण्याचा प्रयत्न केला, तर सरकार त्यांना त्यांच्याच भाषेत उत्तर देईल, हे त्यांनी दाखवून दिले. पंतप्रधानांचे भाषण चालू असताना विरोधक गिल्ला करत असताना सिंदबादच्या (गुलिव्हर) सफरींमधील लिलिपुटच्या घोळक्यात उभ्या असलेल्या सिंदबादची आठवण होत होती. लिलिपुट हा खुज्या सरासरी उंची सुमारे सहा इंच असलेल्या माणसांचा समाज. मात्र त्यांचा अभिमान आणि अहंकार हा सामान्य माणसांएवढाच असतो. ते सामान्यत: लोभी, द्वेषपूर्ण, कारस्थानी, हिंसक, स्वार्थी आणि अविश्वसनीय असतात. त्यांच्यात सिंदबाद हा सामान्य माणूस राक्षसाएवढा उंच दिसतो.


संसदेचे कामकाज व्हावे, ही सत्ताधाऱ्यांची जबाबदारी आहे हे खरेच. पण कामकाज होऊच द्यायचे नाही, हे विरोधकांनी ठरविले तर ब्रह्मदेवही कामकाज चालवू शकणार नाही, हेही खरे. फिदायिन अतिरेक्यांप्रमाणे संसदेच्या कामात व्यत्यय आणण्यासाठी कटिबद्ध झालेल्या खासदारांवर कारवाई तरी काय करणार? अन् केली तरी व्हिक्टिम-व्हिक्टिम खेळण्यास, फॅसिझम वाढल्याचा कांगावा करण्यास ते मोकळेच!


एक तर प्रत्येक भाषण निवडणुकीचे भाषण म्हणून करण्यात मोदींचा हात कोणी धरू शकत नाही. त्यात त्यांनी काँग्रेसचे पुरते वस्त्रहरण केले. राज्यसभेत पंतप्रधान म्हणाले की, ‘ग्रामपंचायतीपासून संसदेपर्यंत अनेक वर्षे सत्ता काँग्रेसकडे होती. मात्र, त्याचे सारे श्रेय एका कुटुंबालाच दिल्याने तो पक्ष आज विरोधी बाकांवर आहे. यंग इंडियाचे स्वप्न स्वामी विवेकानंदांनीही पाहिले होते. विरोधकांना न्यू इंडिया नको असेल, तर ठीक आहे, मलाही गांधींचा भारत हवा आहे, पण काँग्रेसमुक्त भारत ही काही माझी कल्पना नव्हती. स्वातंत्र्य मिळाल्यावर गांधींनीच तशी इच्छा व्यक्त केली होती. आता देशाने ठरवावे की, त्यांना कोणता भारत हवाय,’ असे म्हणून त्यांनी चार अधिकचे गुण मिळविले. खरगेंना चिमटा काढण्याच्या ओघात महात्मा बसवेश्वरांचा दाखला देऊन त्यांनी कर्नाटकातील लिंगायत मतदारांनाही डोळा मारला.


एकाच विषयावर एका तासाच्या आत संसदेच्या दोन सभागृहात पूर्णपणे वेगळा आशय घेऊन बोलणे ही खायची गोष्ट नाही. पक्का गृहपाठ, उत्कृष्ट भाषणशैली आणि राजकीय समज असल्याशिवाय हे साध्य होऊ शकत नाही. शोकसंदेश लिहिण्यासाठी मोबाईलचा पडदा पाहणाऱ्यांना ते जमणारच नाही. एकुणात काय, तर विरोधकांनी काल जे काही केले त्यामुळे त्यांनी स्वतःलाच क्षुद्र करून घेतले. हात दाखवून अवलक्षण कसे करून घ्यायचे, याचा वस्तुपाठच विरोधकांनी घालून दिला.

Tuesday, February 6, 2018

मुखभंगांचे ऐक्ययत्न

opposition unity Indiaदेशात जेव्हा जेव्हा केंद्रातील सत्ताधारी पक्ष अडचणीत असतो, तेव्हा तेव्हा एक खेळ सुरू होतो. त्याला आघाड्यांचा खेळ म्हणतात. आपापल्या सुभ्यांची जहागिरदारी सांभाळणारे सगळे मनसबदार एकत्र येतात आणि आपण मिळून सत्ताधारी पक्षाला पराभूत करू, असे मनसुबे रचतात. साठच्या दशकापासून हा ऊरुस सुरू असून आता ताज्या परिस्थितीत त्याच खेळाचा ताजा अंक सुरू झाला आहे. भाजप व पंतप्रधान नरेंद्र मोदींना आव्हान देण्यासाठी सर्व विरोधी पक्ष आपापले बळ लावून एकजुटीचा प्रयत्न करत आहेत. आज सत्ताधारी असलेला भारतीय जनता पक्ष 1970 ते 90च्या काळात याच खेळाचा भाग होता आणि आजचा अंक त्याच पक्षाविरुद्ध होतोय, ही त्यातली जरा वेगळी गंमत.

या खेळाची सुरूवात केली ती स्वतःच्या विश्वासार्हतेची गंगाजळी खर्चून दिवाळखोर झालेल्या शरद पवारांनी. घटनेवर “हल्ला” होत असल्याचे कारण देऊन तिला वाचविण्यासाठी त्यांनी 26 जानेवारीला मोर्चा काढला होता. भाजपशी लढा देण्यासाठी विरोधी पक्ष नवी दिल्लीत29 जानेवारीला एकत्र येतील, असेही त्यांनी सांगितले होते. त्या मोर्चात पवार यांच्याबरोबर शरद यादव (बंडखोर जनता दल-यू नेते), डी. राजा (सीपीआय), हार्दीक पटेल (गुजरातचे पाटीदार नेते), दिनेश त्रिवेदी (तृणमूल काँग्रेस), सुशीलकुमार शिंदे (काँग्रेस), प्रफुल्ल पटेल, डी. पी. त्रिपाठी (राष्ट्रवादी), असे बहुतेक मोडीत निघालेले चेहरे होते (हार्दिकचा अपवाद करता).


पवारांनी म्हटल्याप्रमाणे दिल्लीत त्यांनी विरोधी नेत्यांना बोलावलेही होते. पण त्यात फारसे कोणी आले नाही. त्यामुळे परत तीन दिवसांनी संयुक्त पुरोगामी आघाडी (यूपीए) अध्यक्षा सोनिया गांधी यांनी आपल्या अध्यक्षतेखाली विरोधकांची बैठक घेतली. माजी पंतप्रधान डॉ. मनमोहन सिंग, काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, अहमद पटेल, गुलाम नबी आझाद आणि मल्लिकार्जुन खडगे, राष्ट्रवादी काँग्रेसचे अध्यक्ष शरद पवार; नॅशनल कॉन्फरन्सचे अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला; राजदचे जयप्रकाश नारायण यादव, तृणमूलचे डेरेक ओब्रायन, सीपीआयचे राष्ट्रीय सचिव डी. राजा आणि सपाचे रामगोपाल यादव यांनी बैठकीला हजेरी लावली.


पवारांची विश्वासार्हता एवढी, की ज्यांच्या भरवशावर त्यांनी मोर्चाची हाक दिली त्या प्रकाश आंबेडकरांनीच त्यांच्याकडे पाठ फिरविली. इतकेच नाही काल त्यांनी पवारांवरही हल्ला चढविला. म्हणजे किमान भारीप-बहुजन महासंघ तरी त्यांच्या गळाला लागणार नाही. हा, पण सीताराम येचुरी (माकपा) आणि माजी मुख्यमंत्री आणि काँग्रेसचे नेते पृथ्वीराज चव्हाण आणि माजी खासदार राम जेठमलानी मात्र प्रजासत्ताक दिनी मोर्चात उपस्थित होते.




“संविधानाने हमी दिलेल्या लोकांच्या मुलभूत हक्कांवर सत्ताधारी पक्षाने “हल्ला केला” आहे. भाजपाचा ‘विनाश’ करून देशाला वाचवू इच्छिणारे सर्व राजकीय पक्ष एकजुट होतील,” असा दावा येचुरी यांनी मारे जोरात केला होता.


“सरकार हुकूमशाहीकडे वाटचाल करत असून लोकशाहीतील सर्व धर्मनिरपेक्ष शक्तींनी भाजपशी लढा देण्याची गरज आहे,“ असे चव्हाण म्हणाले होते.
आता येचुरी आणि चव्हाण हे दावे करत असताना प्रत्यक्षात काय चालू होते?



डावे पक्ष म्हणजे कसे एकसुरात बोलणारे! खासकरून देशापुढील महत्त्वाच्या प्रश्नांवर एकमत असणे, हे त्यांचे खास लक्षण मानले जाते. पण मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पक्षाच्या केंद्रीय समितीच्या (पॉलिट ब्युरो) नुकत्याच झालेल्या बैठकीत काही वेगळेच चित्र पाहायला मिळाले. कोलकाता येथे झालेल्या या बैठकीचा उद्देश होता पुढील लोकसभा निवडणुकीसाठी व्यूहरचना करणे. पण त्यावरूनच पक्षात प्रचंड वादावादी झाली. अन् हे मतभेद शेवटपर्यंत निकाली निघालेच नाहीत. शेवटी त्यावर मतदान घेण्याचा तोडगा काढावा लागला. राजकीय ठरावांचे दोन मसुदे सादर करण्यात आले. यातील एक मसुदा पक्षाचे आजी सरचिटणीस सीताराम येचुरी यांचा आणि दुसरा मसुदा होता माजी सरचिटणीस प्रकाश करात यांच्या गटाचा होता. त्यात अखेर करात गटाला बहुमत मिळाले. त्यांच्या मसुद्याला 55 मते मिळाली, तर येचुरी यांच्या मसुद्याला 31 मते मिळाली.


येचुरी यांच्या प्रस्तावित काय होते? तर पुढील लोकसभा निवडणुकीत भाजपला हरविण्यासाठी काँग्रेससोबत आघाडी करण्याचा प्रस्ताव त्यांनी दिला होता. दुसरीकडे करात यांच्या ज्या प्रस्तावाला बहुमत मिळाले त्या प्रस्तावात काँग्रेसशी कुठलीही युती करण्याला विरोध केलेला होता. अर्थात सध्याची आंतरराष्ट्रीय परिस्थितीचे विश्लेषण व आर्थिक धोरणाबाबत दोन्ही धोरणांमध्ये एकवाक्यताहोती.


अर्थात काँग्रेसमुळे माकपमध्ये मतभेद होण्याची ही काही पहिली वेळ नाही. सन 2016 मध्ये बंगाल विधानसभा निवडणुकीतही काँग्रेसशी सहकार्य करायला करात गटाचा विरोध होता. अन् पक्षाच्या स्थानिक शाखेने काँग्रेससोबत अनौपचारिक सहकार्य करण्याचा निर्णय घेऊनही टाकला होता. मात्र पश्चिम बंगाल माकपचा तो निर्णय फारसा फळाला आला नाही. आज करात गटाच्या काँग्रेसविरोधाला मिळत असलेल्या पाठिंब्यामागे कदाचित तो अनुभवच असावा. एकीकडे तीव्र भाजपविरोध आणि दुसरीकडे काँग्रेसचे वावडे, अशा कात्रीत आज कम्युनिस्ट लोक सापडलेले आहेत. करात आणि येचुरी यांच्यातील द्वंद्व हे माकपच्या बंगाल आणि केरळ शाखेतील द्वंद्व या स्वरूपातही पाहता येईल. आताच्या बैठकीत करात गटाच्या ठरावाला व्ही. एस.अच्युतानंदन यांचा अपवाद वगळता केरळच्या सर्व सदस्यांनी पाठिंबा दिला, ते त्यामुळेच. दुसरीकडे बंगालच्या बहुतेक सदस्यांनी येचुरींच्या बाजूने मत दिले.


येचुरी यांच्या पक्षाचे हे हाल तर काँग्रेसमध्ये आगळेच. हे सगळे मनसबदार तर काँग्रेस म्हणजे तर खुद्द सल्तनतच. त्यामुळे या सर्व सरदारांच्या हाताखाली काम करणे काँग्रेसला कसे मंजूर होईल?


म्हणूनच येत्या लोकसभा निवडणुकीत काँग्रेस हीच विरोधकांच्या एकतेचा कणा बनेल, असे म्हटले आहे. तसेच नरेंद्र मोदी यांना पर्याय केवळ राहुल गांधीच असू शकतात, असेही पक्षाने म्हटले आहे. हा दावा केला आहे. ‘‘मोदींजीचा पर्याय केवळ आणि केवळ राहुलजी हेच आहेत. अन्य कोणीही होऊ शकत नाही. काँग्रेस आणि देशातील लोक राहुलजींना देशाचा पुढील पंतप्रधान म्हणून पाहू इच्छितात,’’ असे ते काँग्रेसचे माध्यम विभागाचे प्रमुख आणि मुख्य प्रवक्ते रणदीप सुरजेवाला यांनी पीटीआय वृत्तसंस्थेला दिलेल्या मुलाखतीत म्हटले आहे.


विरोधकांच्या एकजुटीबद्दल विचारले असता ते म्हणाले, की बिजू जनता दल, शिवसेना आणि आता तेलुगु देसमध्ये पक्ष हळूहळू वेगळे होत आहेत. तर ‘‘काँग्रेस वेगवेगळ्या पक्षांच्या एकतेचा कणा बनत आहे. ही एकता 2019 मध्ये बदलांचा आधार बनेल,’’ असे त्यांचे म्हणणे होते. याचा अर्थ मुलांच्या खेळात ज्या प्रमाणे क्रिकेटचे कौशल्य कोणाकडेही असो, ज्याची बॅट त्याची बॅटिंग पहिली या नियमाप्रमाणे काँग्रेसला खेळायचे आहे.


या असल्या अडेलतट्टूपणाला वैतागूनच नीतीशकुमार यांनी या लोकांना रामराम केला होता. बिहार विधानसभा निवडणुकीत नितीशकुमार यांच्या नेतृत्वाखालील महागठबंधन करून जदयू आणि कॉंग्रेसने भाजपचा धक्कादायक पराभव केला होता. पण गेल्यावर्षी जुलैमध्ये नितीशकुमार (पर्यायाने जेडीयू) पुन्हा भाजपच्या नेतृत्वाखालील एनडीएत परतला होता. राष्ट्रपतीपदाच्या निवडणुकीतही भाजपाविरोधी आघाडी उघडण्याचे प्रयत्न असेच अपयशी ठरले होते.


थोडक्यात म्हणजे उष्ट्राणां लग्नसमये गर्दभाः समुपस्थिताः। परस्परं प्रशंसन्ति अहो रूपं अहो ध्वनिः।। अशी यांची अवस्था होती. आपापल्या राज्यात मुखभंग झालेल्या गणंगांनी एकत्र येऊन मांडलेला हा सत्तेचा सारीपाट आहे. त्याचे दान त्यांच्या बाजूने पडण्याची सध्या तरी सुतराम शक्यता नाही.

Monday, February 5, 2018

वर्षपूर्ती एका आगळ्या निर्णयाची

अमेरिकेचे अध्यक्ष डोनाल्ड ट्रम्प यांनी मुस्लिम देशांतील नागरिकांच्या आगमनावर बंदी घातली त्या आदेशाला जानेवारी महिन्यात एक वर्ष पूर्ण होत आहे. सूत्रे स्वीकारल्यानंतर केवळ तीन आठवड्यांच्या आत, 27 जानेवारी रोजी, ट्रम्प यांनी कार्यकारी आदेशावर स्वाक्षरी केली आणि सात देशांतून येणाऱ्या लोकांच्या संख्येवर मर्यादा घातली होती. कट्टरवादी इस्लामच्या विरोधात कारवाई म्हणून अमेरिकेचे सात देशांतील निर्वासितांवर बंदी घातल्याचे त्यांनी जाहीर केले होते. (सहा मुस्लिम देशांमधील प्रवाशांवर तीन महिन्यांची आणि सिरीयातील निर्वासितांवर कायमस्वरूपी बंदी ).


या प्रवासीबंदीचा बहुतांश काळ कज्जा-खटल्यांमध्येच गेला आहे – न्यायालयाच्या आत आणि बाहेरही. ट्रम्प यांचा हा आदेश धक्कादायक होता आणि अभूतपूर्वही होता. त्यामुळेच अनेक तथाकथित तज्ञांनी त्यावर प्रश्नचिन्ह उभे केले होते. अगदी त्या विरोधात तयार केलेल्या एका दस्तऐवजावर परराष्ट्र खात्याच्या सुमारे 900 अधिकाऱ्यांनी स्वाक्षऱ्या करून रोष व्यक्त केला होता. असे न करण्याबद्दल व्हाईट हाऊसने दिलेल्या तंबीकडे दुर्लक्ष करून त्यांनी हे पाऊल उचलले होते. मात्र हा आदेश बिल्कुल अनपेक्षित नव्हता.


ट्रम्प अध्यक्षपदी येण्यापूर्वीच अमेरिकेत जन्मलेल्या आणि अध्यक्ष बराक ओबामा यांच्याकडून अभय मिळालेल्या बेकायदेशीर स्थलांतरितांना अनेकांनी इशारा दिला होता. “डोनाल्ड ट्रम्प हे अध्यक्ष म्हणून 20 जानेवारी रोजी सूत्रे स्वीकारतील, त्यावेळी देश सोडून जाऊ नका,” असे या स्थलांतरितांना अनेक वकीलांनी सांगितले होते.


बालपणी अमेरिकेत बेकायदेशीरपणे आणलेल्या स्थलांतरितांना मानवीय, शैक्षणिक आणि रोजगाराच्या कारणांमुळे अमेरिकेतच राहू देण्याचे धोरण ओबामा यांनी अंगीकारले होते. सत्तेवर येताच ट्रम्प हे त्या धोरणाला कलाटणी देतील आणि त्यांच्यावर कारवाई सुरू करतील, अशी भीती वकील, कायदेतज्ज्ञ आणि विद्यापीठांतील तज्ज्ञांना वाटत होती. त्याला कारण म्हणझे कारण म्हणजे निवडणूक प्रचाराच्या काळात स्थलांतरितांचा विषय हाच ट्रम्प यांनी मध्यवर्ती मुद्दा बनवला होता. हे स्थलांतरित परदेशी गेले, तर त्यांना परत अमेरिकेत प्रवेश करू दिला जाणार नाही, असे या तज्ज्ञांना वाटत होते.


स्थलांतरित व मुस्लिमांबाबत ट्रम्प यांनी अनेक वादग्रस्त विधाने केली आहेत. जगभरातील स्थलांतरितांवर बंदी आणू आणि अमेरिकन नागरिकांना म्हणजे भूमिपुत्रांनाच रोजगाराकरिता प्राधान्य दिले जाईल, असे आश्वासनही त्यांनी दिले होते. मेक्सिकोतून येणाऱ्या स्थलांतरितांना आळा घालण्यासाठी भींत बांधण्याचाही त्यांनी वारंवार उच्चार केला होता आणि आजही या वचनावर ते कायम आहेत. त्यामुळे ट्रम्प यांच्यावर बाकी काहीही आरोप झाले, तरी आश्वासन न पाळल्याचा आरोप कोणीही करू शकणार नाही. “अमेरिकेतील धार्मिक स्वातंत्र्य आणि सहिष्णुता कायम ठेवण्यासाठी ही बंदी अत्यंत गरजेची होती. अमेरिकेत प्रचंड असहिष्णुता पसरण्यापासून मला रोखायचे होते,” असे स्पष्टीकरण त्यांनी नंतर दिले होते.


प्रवासबंदीच्या ट्रम्प यांच्या आदेशाला अपेक्षेप्रमाणे न्यायालयात आव्हान दिले गेले. आजही हा अमेरिकेच्या सर्वोच्च न्यायालयात हा खटला आहे. मात्र उच्च न्यायालयाने डिसेंबरच्या सुरुवातीला या आदेशाच्या बाजूने कौल दिला होता. सहा देशांतील प्रवाशांवर पूर्ण बंदी लागू करण्यास न्यायालयाने संमती दिली होती. म्हणजेच आजच्या घडीला हा आदेश लागू आहे. इतकेच नाही तर आपल्याकडच्या पुरोगाम्यांप्रमाणे काही जण विरोधासाठी ईर्षेने पुढे आले. ट्रम्प यांच्या निर्णयाच्या निषेधार्थ पुढील पाच वर्षांत 10 हजार निर्वासितांची भरती करणार असल्याचे स्टारबक्स या जगप्रसिद्ध कंपनीने जाहीर केले होते. तर ट्रम्प अमेरीकेत जोपर्यंत मुस्लिमांवर निर्बंध आहेत, तोपर्यंत अमेरिकेच्या अध्यक्षांनाही आपल्या देशात प्रवेश करू देऊ नये, असे ब्रिटनमधील लेबर पार्टीचे नेते जर्मी कोरबिन यांनी म्हटले होते.


परंतु या आदेशाच्या आणि पर्यायाने ट्रम्प यांच्या समर्थकांना ही चांगली घडामोड वाटते. “अमेरिकेत प्रवेश करणाऱ्या परदेशी नागरिकांच्या दहशतवादी हल्ल्यांपासून संरक्षण करण्यासाठी अमेरिकेचे ट्रम्प यांनी संरक्षण केले.” असेच त्यांना वाटते. मात्र आपल्याला वाटतो तेवढाही काही हा आदेश कौतुकास्पद नव्हता. कारण कट्टरवादी इस्लामची खाण असलेल्या पाकिस्तान आणि सौदी अरेबिया यांचा या आदेशात समावेश नव्हता.

“पाकिस्तान आणि सौदी अरेबिया यांना वगळून कट्टरवादी इस्लामचा पराभव करता येणार नाही. त्यामुळे हे पाऊल अर्थहीन आहे,” असे अमेरिकेत स्थायिक झालेले संशोधक अरिफ जमाल यांनी तेव्हाच म्हटले होते. सौदी अरेबिया आणि पाकिस्तान हे अमेरिकेचे सहकारी असतील, तोपर्यंत कट्टरवादी इस्लामला पराभूत करणे अशक्य आहे, असे जमाल यांनी डॉईट्शे वेले या जर्मन माध्यमसंस्थेला दिलेल्या मुलाखतीत सांगितले होते.
“अमेरिकेत 2001 पासून झालेल्या निरनिराळ्या दहशतवादी घटनांमध्ये सौदी अरेबिया आणि पाकिस्तानी नागरिकांचा सहभाग आढळला आहे. तरीही ट्रम्प यांचे व्यावसायिक हीत गुंतले असल्यामुळेच त्यांनी पाकिस्तान आणि सौदी अरेबियाला हात लावला नाही, अशी शक्यता अमेरिकेतील माध्यमांनी व्यक्त केली आहे. मात्र हे फक्त सौदी अरेबियाच्या बाबतीत खरे आहे, कारण पाकिस्तानात त्यांची कोणतीही गुंतवणूक केलेली नाही, ” असेही जमाल म्हणालेहोते.
ट्रम्प यांच्या आदेशाला रिपब्लिकन हिंदू कोअॅलिशन या संघटनेने पाठिंबा देऊन पाकिस्तान, अफगाणिस्तान आणि सौदी अरेबिया यांचाही समावेश करावा, असे संघटनेने म्हटले आहे.


संघटनेचे अध्यक्ष शलभ कुमार यांच्या म्हणण्यानुसार,“इस्लामी दहशतवादापासून आपल्या नागरिकांना वाचविण्यासाठी ट्रम्प सरकारने घेतलेल्या या निर्णयक पावलाचे आम्ही कौतुक करतो. दहशतवादाच्या विरोधात ठोस भूमिका हा आमच्या संघटनेचा एक आधारस्तंभ आहे तर ट्रम्प यांच्या प्रचारमोहिमेच्या मध्यवर्ती मुद्द्यांपैकी एक आहे. आपल्या देशाच्या संरक्षणासाठी आपल्या सरसेनापतींनी उचललेल्या आवश्यक पावलाला आम्ही संपूर्ण पाठिंबा देतो.”


त्या यादीत पाकिस्तानचा समावेश केलेला नसला, तरी नंतरच्या काळात ट्रम्प सरकारने पाकिस्तानच्या विरोधात पुरेशी पावले उचलली आहेत. त्यामुळे त्यांनी ते केले नाही तरी बोल लावता येणार नाही. पण अशक्यप्राय वाटणारी गोष्ट शक्य कशी करावी, याचा वस्तुपाठच ट्रम्प यांनी त्या आदेशातून घालून दिला. त्यांचा हा प्रयत्न यशस्वी ठरतो का नाही हा वेगळा प्रश्न आहे, पण एक वेगळा प्रयत्न म्हणून त्याची निश्चितच नोंद घ्यावी लागेल.